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जल्लाद नाटा को भी फाँसी का सदमा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बलात्कार और हत्या के दोषी ठहराए गए धनंजय चटर्जी को कोलकाता की सेंट्रल जेल में फांसी देने के बाद जल्लाद नाटा मलिक की तबियत इतनी ख़राब हो गई कि उन्हें स्ट्रेचर पर अस्पताल ले जाना पड़ा. मलिक ने अपने बेटे महादेव की सहायता से धनंजय के गले में रस्सी डाली और उसे फांसी पर लटका दिया. कोलकाता से बीबीसी संवाददाता सुबीर भौमिक का कहना है कि धनंजय को जब फांसी देने के लिए ले जाया जा रहा था तो वह पूरी तरह शांत था और उसने हाथों में भगवद गीता की एक प्रति ली हुई थी. फांसी तड़के साढ़े चार बजे दी गई थी. उससे पहले धनंजय ने पूरी रात जाग कर बिताई और खाना भी नहीं खाया. अधिकारियों का कहना है कि कुछ दिन पहले से ही वह अपने एकांत कक्ष मे भजन सुना करता था.
फांसी लगने के समय डॉक्टरों की एक टीम वहाँ मौजूद थी क्योंकि धनंजय ने अपनी आँखें और गुर्दे दान देने का ऐलान किया था. लेकिन बाद में उसके घर के लोगों ने इस बारे में अनुमति देने से इनकार कर दिया. कई मानवाधिकार कार्यकर्ता धनंजय की फाँसी का विरोध कर रहे थे और उन्होंने मोमबत्तियाँ जला कर और गीत गाकर अपना आक्रोश ज़ाहिर किया. कुछ एजेंसियों के मुताबिक धनंजय ने फांसी का फंदा गले में डाले जाने से पहले वहाँ मौजूद अधिकारियों से कहा, आप सब का मंगल हो. उन्होंने धनंजय को यह कहते भी बताया है कि, "मैं निर्दोष हूँ." |
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