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संघ की शाखा में अब टीशर्ट और बरमूडा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सफ़ेद कमीज़ और खाकी निकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सदस्यों की वर्षों से पहचान रही है लेकिन इन दिनों संगठन समय के साथ अपनी पहचान भी बदल रहा है. ख़ुद को हिंदू धर्म का ध्वजवाहक कहने वाले इस संगठन में अब टीशर्ट और घुटने तक लंबे चुस्त पैंट पहनने वालों का भी सुबह की 'शाखा' में स्वागत है. संघ के प्रवक्ता राम माधव कहते हैं कि पोशाक के नियमों में बदलाव की वजह "सुविधा और व्यावहारिकता" है. लगभग अस्सी वर्ष पुराने इस संगठन की पोशाक लंबे समय से सुबह की सभाओं के लिए एक ही रही है---सफ़ेद कमीज़, ख़ाकी निकर और काले जूते. संघ के अंदाज़न तेरह लाख सदस्य हैं जो देश भर में तकरीबन पचास हज़ार शाखाओं में शामिल होते हैं, और अब वे चाहें तो टीशर्ट, बरमूडा हाफ़पैंट और काले स्पोर्ट्स शू पहनकर आ सकते हैं. 'शाखा' के नाम से जानी जाने वाली प्रातःकालीन सभा पार्कों, मैदानों और शैक्षणिक संस्थानों के परिसर में होती है जिसमें लाठी चलाने, कसरत करने से लेकर राजनीतिक बहस करने तक की शिक्षा दी जाती है. सुबह एक घंटे तक चलने वाली इन शाखाओं में शामिल होने वालों की उम्र 10 से लेकर 70 वर्ष के बीच तक होती है. आरएसएस की स्थापना 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर शहर में इस संकल्प के साथ हुई थी कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना है. आरएसएस के आलोचकों का कहना है कि उसके विचार-सिद्धांत अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता और संकीर्णता पर आधारित हैं. फ़ैशन? संघ के आलोचक उन्हें 'निकरवाले' कहते हैं, ऐसे में अपनी पहचान निकर के बदले दूसरे डिज़ाइन के हाफपैंट पहनने की छूट देने मतलब क्या है? क्या आरएसएस नए फ़ैशन को अपना रहा है या फिर अपनी पुरानी वैचारिक दिशा से हट रहा है?
इस सवाल के जवाब में संघ के प्रवक्ता राम माधव कहते हैं, "हमारी शाखा में फ़ैशन की बात सोचने की गुंजाइश नहीं है, वहाँ आप योग करते हैं, कसरत करते हैं, ज़मीन पर बैठते हैं." कहीं ऐसा तो नहीं कि आज के ज़माने के युवा सदस्य हवा में लहराती निकर पहनकर घर से बाहर निकलने में झेंपते हैं? राम माधव कहते हैं, "अगर हम उन्हें निकर में ऑफ़िस जाने को कहें तो वे झेपेंगे, वे निकर पहनकर लोगों के बीच यूँ ही नहीं घूमते, वे तो सिर्फ़ शाखा में निकर में आते हैं, झेंपने की क्या बात है?" वे सवाल उठाते हैं, "हाफ़ पैंट या शॉर्ट्स के बारे में इतनी बड़ी बात क्या है, हम देखते हैं कि सब लोग--मर्द और औरत--पार्कों में जॉगिंग करते हैं, डिस्को में डांस करते हैं कई बार तो सड़कों पर छोटे से छोटे कपड़े पहनकर निकलते हैं." उनका तर्क है कि अब तो घुटने तक के पैंट हर जगह दिखते हैं, यहाँ तक कि लोग विमान में, रेल में और सिनेमा हॉल में उन्हें पहनकर आने लगे हैं. आरएसएस के प्रवक्ता का कहना है कि पोशाक में बदलाव से थोड़ी सी समस्या भी है, वे कहते हैं, "कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अपने बरमूडा पैंट की ज़्यादा चिंता है और शाखा की गतिविधियों की कम." अब देखना यही है कि संघ के कितने सदस्य नई शैली को अपनाते हैं और कितने लोग परंपरा से बंधे रहना पसंद करते हैं. |
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