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अदालत ने राव के ख़िलाफ़ वारंट को रोका | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आंध्र प्रदेश में हैदराबाद की एक अदालत ने केंद्रीय मंत्री के चंद्रशेखर राव के ख़िलाफ़ जारी ग़ैर ज़मानती वारंट को लागू करने पर रोक लगा दी है. अदालत ने पुलिस को राव को गिरफ़्तार नहीं करने का आदेश भी दिया है. हैदराबाद के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने के चंद्रशेखर राव को 15 सितंबर को अपनी अदालत में तलब भी किया है. राव के ख़िलाफ़ ये वारंट धोखाधड़ी के एक मामले में जारी किया था. अदालत ने गैर ज़मानती वारंट तब जारी किया जब वे कोर्ट के सम्मन जारी करने के बाद भी अदालत में हाज़िर नहीं हुए थे. मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने ग़ैर ज़मानती वारंट तेलंगाना राष्ट्र समिति के एक अन्य नेता और वकील एम प्रहलाद गांधी की याचिका पर जारी किया था.
लेकिन मंत्री के अदालत में उपस्थित न होने के कारण उनके खिलाफ़ गैर ज़मानती वारंट जारी कर दिया गया. चंद्रशेखर राव को मनमोहन सिंह की कैबिनेट में जहाज़रानी मंत्री बनाया गया था लेकिन उन्होंने डीएमके और कांग्रेस के बीच हुए टकराव को टालने के लिए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. सरकार गठन के बाद डीएमके ने जहाज़रानी मंत्रालय की माँग रखी थी. इस्तीफ़ा देने के बाद से चंद्रशेखर राव के पास कोई मंत्रालय नहीं है. प्रहलाद ने अपनी याचिका में अदालत में आरोप लगाया था कि राज्य विधानसभा के चुनाव में राव ने चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट दिलवाने के नाम पर 778 लोगों से 7.8 लाख रुपए लिये थे. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि न तो उन्हें पार्टी का टिकट ही दिया गया और न ही पार्टी अध्यक्ष ने उनकी रक़म लौटाई. वे कहते हैं कि राव ने इस पैसे को पार्टी फंड में न तो जमा ही किया और न ही कहीं इसे दिखाया. प्रहलाद का आरोप है कि राव ने पार्टी कार्यकर्ताओं को सभी 107 सीटों पर टिकट दिलाने का वादा किया था लेकिन राज्य में कांग्रेस पार्टी से गठबंधन हो जाने के बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति को मात्र 42 सीटें ही मिल पाईं. |
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