चीन के प्रधानमंत्री चाउ एनलाई ने दिसंबर 1953 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत में पंचशील का सिद्धांत रखा था. इसके बाद चीन के तिब्बत क्षेत्र और भारत के बीच व्यापार और सहयोग के लिए 29 अप्रैल 1954 को एक संधि हुई और संधि की प्रस्तावना में पहली बार औपचारिक तौर पर पंचशील सिद्धांत को शामिल किया गया. कुछ दिनों बाद चाउ एनलाई भारत आए और 28 जून 1954 को उन्होंने और भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने एक साझा बयान जारी किया जिसमें पंचशील सिद्धांतों को आधार बनाकर भविष्य की कार्ययोजना का उल्लेख किया गया. पंचशील की पचासवीं वर्षगाँठ पर बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति-
भारत-चीन रिश्तों का आधार पंचशील भारत और चीन के संबंधों को प्रभावित करने वाले पंचशील के सिद्धांत पर पचास वर्ष पहले 29 अप्रैल 1954 को हस्ताक्षर हुए थे. इस समझौते की प्रस्तावना में पाँच सिद्धांत थे जो अगले पाँच साल तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे. इसके बाद ही हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगे और भारत ने गुट निरपेक्ष रवैया अपनाया.
पचासवीं वर्षगाँठ पर कई कार्यक्रम भारत और चीन के संबंधों को प्रभावित करने वाले पंचशील के सिद्धांत की पचासवीं वर्षगाँठ दोनों ही देशों में धूमधाम से मनाई जाएगी. इस मौक़े पर एक डाकटिकट भी जारी किया जाना है. उधर चीन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में चीन के प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ हिस्सा लेंगे.
नेहरू की विदेश नीति का अहम हिस्सा था पंचशील जवाहरलाल नेहरु ने भारत की विदेश नीति को एक ऐसे अवसर के रुप में देखा जिसमें वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में स्थापित कर सकें. जवाहर लाल नेहरु की विदेश नीति की ख़ूबियों और कमज़ोरियों पर सुपरिचित लेखक और संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारी शशि थरुर की टिप्पणी.
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