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गुरुवार, 13 मई, 2004 को 20:05 GMT तक के समाचार
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झारखंड:अपने गढ़ में हारी भाजपा

यशवंत सिन्हा
सिन्हा की मुस्कुराहट फीकी पड़ी
झारखंड राज्य की कुल १४ सीटों में से भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली है.

झारखंड 2000 में बिहार से अलग होकर नया राज्य बना था और यहाँ यहाँ राजग की सरकार है.

भाजपा ‘फील गुड’ के साथ-साथ, ‘झारखंड अलग राज्य गठन’ का श्रेय लेने की कोशिश करते हुए चुनाव लड रही थी.

झारखंड को भाजपा अपना गढ मानती रही है. 1996 में इस अंचल की कुल 14 सीटों में से 13 पर भाजपा जीती थी.

1998 के चुनावों में 14 में से 12 सीटों पर भाजपा को कामयाबी मिली. 1999 के लोकसभा चुनाव में भी 14 में से 11 सीटें भाजपा के खाते में गईं पर अलग राज्य बनाने और झारखंड में साढे तीन वर्षों से शासन करने के बाद 2004 के चुनावों में भाजपा को मात्र एक सीट मिली है.

यह अकेली सीट जीती है राज्य के पूर्व और पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने सामान्य कोडरमा लोकसभा क्षेत्र से.

इसी कोडरमा सीट से सटे हज़ारीबाग संसदीय क्षेत्र से राजग सरकार में वित्त और विदेश मंत्री रहे यशवंत सिन्हा लगभग एक लाख पाँच हजार मतों से चुनाव हार गए.

उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भुवनेश्वर मेहता ने हराया. मेहता को अन्य राजग विरोधी दलों ने भी समर्थन दिया था.

पाँच बार सांसद रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और राजग की केंद्र सरकार में मंत्री रहे कडया मुंडा भी झारखंड के खूंटी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए.

राजग सरकार में ही मंत्री रहीं भाजपा की रीता वर्मा धनबाद से चुनाव हार गईं.

जिस राँची लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के रामटहल चौधरी चौथी बार वर्ष 1999 में दो लाख 44 हज़ार वोटों से विजयी हुए थे उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी सुबोध कांत सहाय ने हरा दिया है.

झारखंड के परिणाम जहाँ भाजपा के लिए सदमा हैं वहीं लगभग आठ वर्षों बाद कांग्रेस ने झारखंड में फिर से पैर जमाए हैं.

हालाँकि कांग्रेस-झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने गंठबंधन के तहत यहाँ चुनाव लडा था और कांग्रेस को 14 में से छह सीटें मिली हैं और झामुमो को चार.

1999 में कांग्रेस को दो और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को एक सीट मिली थी.

उस साल झामुमो का खाता नहीं खुला था.

लालू प्रसाद के लिए उत्साहवर्द्धक ख़बर है कि राष्ट्रीय जनता दल के उनके दोनों प्रत्याशी झारखंड के पलामू और चतरा संसदीय क्षेत्र से विजयी हुए हैं.

झारखंड से भाजपा के लगभग सफाए की कल्पना, कांग्रेस-झामुमो को भी नहीं थी.

दाव उल्टे पड़े

विश्लेषकों का कहना था कि कम से कम पाँच-छह सीटें भाजपा जीत लेगी क्योंकि कांग्रेस बिखरी हुई थी.

भाजपा प्रचार-प्रसार में झारखंड में भी चुस्त और सक्रिय थी पर सारे अनुमान उलट चुके हैं.

भाजपा की हार के दो मुख्य कारण हैं. पहला, अलग राज्य गठन के बाद राजग सरकार की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और असंवेदनशीलता.

यशवंत सिन्हा और ख़ुर्शीद महमूद कसूरी
सिन्हा पर और भी ज़िम्मेदारियाँ थीं

भाजपा ने झारखंड में सरकार बनते ही अनेक ऐसे मुद्दे सरकार ने छेड दिए कि भाजपा का समर्थन आधार बिखरता गया.

बाहरी-भीतरी के मुद्दे, डोमेसाइल प्रकरण और पंचायत आरक्षण के सवाल पर ग़ैर आदिवासी महतो, सदान व आदिवासी समूहों में दूरी बढती गई.

ये सारे समूह भाजपा के समर्थक आधार वर्ग थे. डोमिसाइल नीति के कारण शहरी लोगों ने साथ नहीं दिया. आरक्षण रोस्टर और पंचायत चुनाव न होने ग्रामीण मतदाताओं ने साथ नहीं दिया.

यानी माया मिली न राम. डोमिसाइल प्रकरण के बाद राजग सरकार में आपसी झंझट बढा और भाजपा के एक मुख्यमंत्री दो साल में ही विदा हो गए. दूसरे की ताजपोशी हुई तो लेकिन इससे राजनीतिक अस्थिरता बढी.

दूसरा कारण, भाजपा के टिकट पर बार-बार चुनाव जीत रहे भाजपाई सांसदों का लगातार जनता से कटते जाना और दल के स्तर पर झारखंड में सरकार बनने के बाद भाजपा के अंदर की गुटबाजी और कलह.

भाजपा नेता राजग सरकार से अधिकाधिक ठेके लेने और कमाई करने-कराने में लग गए. हालत यह हो गई कि चुनाव के दिन भाजपा प्रत्याशियों को ‘बूथ मैनेजमेंट’ के लिए कार्यकर्त्ता नहीं मिले.

कॉडर आधारित पार्टी केंद्र और राज्य में अपनी सरकारों के बावजूद कॉडर विहीन होती गई.

झारखंड में भाजपा की ज़बरदस्त पराजय के पीछे एक और महत्वपूर्ण वजह है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष के कारण ही झारखंड में भाजपा बढी.

ग़ौरतलब है कि अविभाजित बिहार के इसी अंचल में पशुपालन घोटाला हुआ था. तब भाजपा नेता, इस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में सबसे आगे थे पर झारखंड में सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ गंभीर आरोपों से घिरे लोग ही भाजपा के प्रिय बन गए.

मात्र सत्ता पाने के लिए भ्रष्टाचार को सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करने वाली पार्टी से लोगों का मोहभंग होता गया. झारखंड में भाजपा चुनाव प्रचार का कमान विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा के हाथ में था, जो अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर ही नहीं निकल सके.

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