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गुरुवार, 13 मई, 2004 को 21:02 GMT तक के समाचार
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कितने चमके फ़िल्मी सितारे

गोविंदा
मुंबई के सितारे नेता सुनील दत्त और गोविंदा
2004 के लोकसभा चुनाव में चौकाने वाले नतीजे आए हैं और कई बड़े नेताओं को हार का मुँह देखना पड़ा है.

लेकिन फ़िल्मी सितारों के लिए ये चुनाव सौभाग्यशाली कहे जा सकते हैं, केवल कुछ को छोड़कर.

ज़्यादातर फ़िल्मी सितारों ने चुनाव जीत लिया लेकिन कुछ ऐसे नाम भी थे जो अपनी फ़िल्मी चमक-दमक के बावजूद हार को नहीं टाल सके

हारने वालों में सबसे पहले नाम लिया जा सकता है भूपेन हज़ारिका का जिन्होंने असम की गुवाहाटी सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था.

हज़ारिका प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे हैं और जब उन्होंने भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया था तो कुछ अटपटा ज़रूर लगा था.

एक रचनात्मक हस्ती के रूप में भूपेन हज़ारिका की साख अच्छी ख़ासी थी और दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने से उसमें चार चांद लग गए थे.

लेकिन गुवाहाटी में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर कांग्रेस के किरिप चलीहा से क़रीब 61 हज़ार वोटों से हारने के बाद अब उनका दिल 'हूम-हूम' कर रहा होगा.

भूपेन हज़ारिका
हज़ारिका को कांग्रेस प्रत्याशी ने हरा दिया

दूसरा बड़ा नाम है टेलीविज़न धारावाहिक की आदर्श बहू स्मृति ईरानी का जो 'विरानी परिवार की बहू' होने के नाते अपनी साख को राजनीति में भुनाने के लिए दिल्ली की चांदनी चौक सीट से मैदान में उतरी थीं लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार और मशहूर वकील कपिल सिब्बल के सामने उनकी चल नहीं पाई.

स्मृति ईरानी की चुनाव सभाओं में भीड़ तो काफ़ी उमड़ी थी लेकिन शायद मतदाताओं ने सोचा होगा कि आदर्श बहू को नज़दीक से देखने का इससे अच्छा मौक़ा और भला क्या हो सकता है फिर आज के मतदाता को समझना काफ़ी मुश्किल है.

जो नज़र आता है परिणाम अक्सर उससे उलट ही होता है और इन चुनावों में स्मृति ईरानी ही नहीं कई बड़े नेताओं को भी मतदाताओं ने औंधे मुँह गिरा दिया है.

सितारे चमके

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि फ़िल्मी चकाचौंध का कोई असर ना चला हो क्योंकि ज़्यादातर फ़िल्मी सितारे अपनी सीटें जीतकर लोकसभा में दाख़िल होने में कामयाब हो गए हैं.

स्मति ईरानी का चुनाव प्रचार
आदर्श बहू के समर्थन में कई कलाकार आए

सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण जीत है कांग्रेस के टिकट पर गोविंदा की जिन्होंने उत्तरी मुंबई सीट से जीतकर केंद्रीय मंत्री रह चुके भाजपा उम्मीदवार राम नाइक को हराया. वह पाँच बार से लगातार उस सीट से जीतते आ रहे थे.

धर्मेंद्र और जयाप्रदा ने पहली बार लोकसभा चुनाव में क़दम रखा था और औपचारिक रूप से जनप्रतिनिधि बन गए हैं.

हालाँकि जया प्रदा पहले भी तेलुगुदेशम पार्टी से राज्यसभा की सदस्य रह चुकी हैं लेकिन इस साल के लोकसभा चुनाव में वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट के लिए मैदान में उतरीं और उन्होंने वहाँ से नवाबी ख़ानदान की नूरबानो को हरा दिया.

जया प्रदा
राजनीति की सीढ़ी चढ़ रही हैं

नूर बानो वहाँ से कई बार सांसद रह चुकी थीं और जयाप्रदा रामपुर के लिए तो बिल्कुल ही नई थीं लेकिन मतदाताओं को शायद उनका अंदाज़ पसंद आ गया जिन्होंने उन्हें जिता भी दिया.

उनके अलावा राज बब्बर का नाम यूँ तो अब राजनीतिक हल्कों में नया नहीं है और वह काफ़ी अनुभवी हो चुके हैं मगर फिर भी उन्हें फ़िल्मी सितारों की सूची से बाहर नहीं किया जा सकता.

उन्होंने एक बार फिर आगरा की सीट समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत ली है. पिछली बार भी वह इसी सीट से लोकसभा में पहुँचे थे.

हेमा मालिनी के साथ धर्मेंद्र के विवाह को लेकर ख़ासा विवाद भी छिड़ा लेकिन उनके दोनों बेटों सनी देयोल और बॉबी देयोल ने राजस्थान की बीकानेर सीट के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया और हिंदी फ़िल्मों के 'ही-मैन' रह चुके 'धरम पा' भाजपा के टिकट पर अपनी सीट निकाल ले गए.

विनोद खन्ना ने पंजाब की गुरदासपुर से तीसरी बार भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और कामयाब हो गए. अब तो लगता है कि वे राजनीतिक गुर अच्छी तरह सीख चुके हैं.

धर्मेंद्र
फ़िल्मी डॉयलागों ने रंग दिखाया

चुनावी गतिविधियों पर नज़र डालें तो तमाम पार्टियों ने फ़िल्मी हस्तियों को अपनी ओर रिझाने की कोशिश की थी, कुछ तो औपचारिक रूप से राजनीतिक दलों में शामिल हो गए थे लेकिन कुछ ने चुनाव प्रचार में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया.

पर गिने चुने लोगों को चुनावी मैदान में उतारा गया था और एक दो को छोड़कर उन्होंने राजनीति में भी अपनी चमक बरक़रार रखी है.

इतना ही नहीं कुछ उम्मीदवारों ने अपने चुनाव प्रचार में फ़िल्मी हस्तियों का जमकर प्रदर्शन किया था जिनमें शिवसेना के उम्मीदवार संजय निरुपम भी थे जिन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार सुनील दत्त के ख़िलाफ़ प्रचार में जितेंद्र, सुनील शेट्टी, महेश मंजरेकर, पूनम ढिल्लो वग़ैरा को भी मंच पर उतारा था लेकिन वह नुस्ख़ा चल नहीं पाया और मतदाताओं के फ़ैसले में राजनीतिक परिपक्वता भी नज़र आई.

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