|
छत्तीसगढ़ में कमल क्यों खिला? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहा एक-एक उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी से चुनाव हार गया है. अजीत जोगी इसके अपवाद कहे जा सकते हैं लेकिन राजनीतिक सच ये है कि महासमुंद में न तो कांग्रेस चुनाव लड़ रही थी और न ही भारतीय जनता पार्टी. वहाँ तो विद्याचरण शुक्ला के ख़िलाफ़ अजीत जोगी चुनाव लड़ रहे थे जिसमें अजीत जोगी जीत गए. छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद पहले मुख्यमंत्री के रुप में अजीत जोगी ने तीन सालों तक जिस तरह की व्यक्तिवादी राजनीति की उसने कांग्रेस पार्टी के ढाँचे को बहुत नुक़सान पहुँचाया. सोनिया गाँधी का नाम ले लेकर अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ में बहुत कुशलता से कांग्रेस को अपने नाम का पर्याय बना दिया. इसीलिए विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और लोकसभा के समय कांग्रेस के पास ऐसा कोई नेता नहीं था जो राज्य में पार्टी की बागडोर संभाल पाता. लिहाज़ा हर उम्मीदवार के पास कांग्रेस का 'हाथ' तो था लेकिन छवि उसकी अपनी थी और संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा भी उसका अपना था. छवि और ताक़त चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ के दौरे के वक़्त मैंने देखा था कि कांग्रेस के उम्मीदवारों को किस तरह अपनी ख़ुद की छवि और अपनी ताक़त के साथ लड़ना पड़ रहा था. प्रदेश अध्यक्ष मोतीलाल वोरा और कार्यकारी अध्यक्ष चरणदास महंत की अपनी कोई ऐसी छवि नहीं है जिसके भरोसे कांग्रेस की नैया पार लगती. उससे बड़ी दिक़्क़त ये थी कि चुनाव के पहले तक तो वोरा से लेकर श्यामाचरण शुक्ला तक हर नेता की पूरी ताक़त इस बात पर लगी हुई थी कि प्रदेश से अजीत जोगी की छवि को कैसे धूमिल किया जाए, उनके लोगों को किस तरह किनारे किया जाए.
उधर भाजपा के किसी भी उम्मीदवार की न तो अपनी कोई छवि थी और न उसे इसकी ज़रुरत थी क्योंकि उनका सारा ज़िम्मा तो तो अटलबिहारी वाजपेयी ने उठा रखा था. भाजपा भले ही पूरे देश में वाजपेयी के नाम को भुना पाने में सफल न हो पाई हो लेकिन छत्तीसगढ़ में उनका पूरा फ़ायदा भाजपा को मिला. बस्तर के सुदूर इलाक़े में आदिवासी लोग इंदिरा गाँधी के बाद सिर्फ़ दो लोगों को जानते हैं - एक अजीत जोगी को और दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी को. चूँकि कांग्रेस ने अजीत जोगी को पिछले कई महीनों से हाशिए पर रखा हुआ था और चुनावी बागडोर उनके हाथ में नहीं थी इसलिए लोगों ने वाजपेयी के चुनाव चिन्ह कमल के फूल मोहर लगाना ही ठीक समझा. वाजपेयी की इस छवि को बिजली, टीवी, रेडियो और अख़बार वाले गाँवों के आदिवासियों तक पहुँचाने के लिए आरएसएस ने जितना काम किया उसे कांग्रेस पहचान नहीं पाई. फिर भाजपा के पक्ष में एक और बात थी कि प्रदेश में उसकी सरकार मात्र छह महीने पुरानी थी इसलिए सरकार के कामकाज से या काम न करने की नाराज़गी भी लोगों में अभी पैदा नहीं हुई थी. इन समीकरणों के भरोसे भाजपा ने छत्तीसगढ़ में फ़ीलगुड का भरोसा दिलाने में सफलता पाई है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||