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गुजरात में अब 'हिंदुत्व' नहीं 'विकास' मुद्दा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात में लोकसभा सीटों के लिए हुए चुनाव डेढ़ वर्ष पूर्व हुए विधानसभा चुनावों से बिल्कुल अलग था. एक तो इस चुनाव में ज़रा भी जोश दिखाई नहीं दिया दूसरे चुनावी मुद्दे भी बदल चुके थे. मिसाल के तौर पर हिन्दुत्व का मुद्दा इस बार किसी भी पार्टी ने नहीं उठाया. भाजपा अपने प्रचार में हिन्दुत्व की बात छोड़ विकास के मुद्दे उठाए. न तो कहीं गोधरा कांड का जिक्र था और न ही उसके बाद के दंगों की बात थी. प्रदेश मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को अपना निशाना बनाए रखा और एक दो जगह ऐसी भाषा का प्रयोग किया जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा हो गया. एक और दिलचस्प चीज़ जो यहां देखने में आई वो थी विश्व हिन्दू परिषद और अन्य संघ परिवार के संगठनों की चुनाव प्रचार से दूरी. पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार इस संगठनों ने खुलकर भाजपा के लिए प्रचार नहीं किया. इन्होंने पार्टी की मदद चुपचाप की. कांग्रेस ने भी अपने चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दे उठाए और लोगों के सामने केन्द्रीय और प्रदेश सरकार की विफलताओं को गिनाया. देश भर में धर्म निरपेक्षता का दावा करने वाली इस पार्टी ने सन 2002 में हुए दंगों से पीड़ित लोगों की बात अपने प्रचार में नहीं की. मुसलमानों की उपेक्षा दंगों से पीड़ित मुसलमानों को तो मानों पूरी चुनावी प्रक्रिया से ही दूर रखा गया.
मिसाल के तौर पर दोनों ही पार्टियों ने मुस्लिम इलाकों में न तो प्रचार किया और न ही उसने सार्वजनिक रूप से वोट मांगे. इससे मुस्लिम समुदाय में खासा रोष देखने में आया. इस समुदाय का कहना है कि जब मुसलमान भी इस देश का नागरिक हैं और प्रजातंत्र में बराबर का हिस्सेदार है तो उसे चुनावी प्रक्रिया से दूर क्यों रखा गया. बहुत से दंगा पीड़ितों को तो ये भी मालूम नहीं था कि उन्हें वोट कहां पर डालने जाना है. विस्थापित हुए इन लोगों का कहना था कि उन्हें किसी ने ये नहीं बताया कि उन्हें अपना वोट अपने गांवों में जा कर देना है या फिर पिछले चुनावों के दौरान बताए गए विशेष बूथों पर. साथ ही इन्हें चिंता थी अपनी सुरक्षा की. भाजपा ने चुनाव से पहले कुछ जाने पहचाने मस्लिम चेहरे अपने में शामिल करने की नाकाम कोशिश की थी. कांग्रेस को उम्मीद
मुस्लिम मतदाता खास तौर पर कांग्रेस से बहुत नाराज़ था. उनका कहना था कि क्योंकि उनके पास कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है उन्हें कांग्रेस को ही वोट देना पड़ता है, पर कांग्रेस ने उनके हितों का ख्याल नहीं रखा. कोई भी पिछले चुनावों में भाजपा ने गुजरात की 26 सीटों में से 21 पर जीत हासिल की थी. पर इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी सीटों में बढ़ोत्तरी होगी. इसका एक कारण ये है कि कांग्रेस में भीतरी टकराव कुछ कम हुआ है पर दूसरी ओर भाजपा में अंतर्कलह बढ़ा है. इसके अलावा कांग्रेस जनजातीय क्षेत्रों में दोबारा बढ़त लेने की उम्मीद रख रही है. जिन सीटों पर कांग्रेस मजबूत स्थिति में है वो है खेड़ा, आनंद, पोरबंदर, कपड़वंज, साबरकांठा, बनासकांठा, पाटन और सुरेन्द्रनगर, वलसाड और कच्छ. स्थानीय मुद्दे गुजरात के मुख्य स्थानीय मुद्दे हैं पानी, बिजली, बेरोज़गारी और सामाजिक विघटन. जहां दोनों पार्टियों ने पानी और बिजली के मुद्दे को प्रचार के दौरान उठाया वहीं उन्होंने बाकी के दोनों मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी. यहां अगर कांग्रेस का प्रदर्शन बोहतर रहता है तो भाजपा में फेर-बदल होने की उम्मीद की जा सकती है. देखना ये है कि क्या विकास का मुद्दा भाजपा को उतने ही वोट दिला सकता है जितना पिछले विधानसभा चुनावों मे हिन्दुत्व ने दिलवाया था. |
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