|
दिल्ली में कांग्रेस को फ़ायदे की संभावना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस बार दिल्ली की लोक सभा सीटों के लिए चुनाव को बहुत दिलचस्प माना जा रहा है. दिल्ली राज्य में तो कांग्रेस की सरकार है और सातों लोक सभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का क़ब्ज़ा है इसलिए मुक़ाबला वाक़ई दिलचस्प होगा. हर बार की तरह इस बार भी कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई है. हालाँकि बहुजन समाज पार्टी ने सभी सातों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. इस चुनाव में एक बार फिर 1984 के दंगों की चर्चा हो रही है. दरअसल जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और आरके आनंद को कांग्रेस ने मैदान में उतार दिया है और भाजपा आरोप लगा रही है कि 84 के दंगों से कथित रुप से जुड़े लोगों को टिकट दे दिया गया है. जगदीश टाइटलर की टक्कर केंद्रीय मंत्री विजय गोयल से है जो अपनी सीट चाँदनी चौक छोड़कर दिल्ली सदर सीट पर आ गए हैं. यह सीट मदन लाल खुराना के राज्यपाल बन जाने से खाली हो गई थी. सज्जन कुमार बाहरी दिल्ली सीट पर दूसरे केंद्रीय मंत्री और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के सामने हैं. जबकि मशहूर वकील आरके आनंद दक्षिणी दिल्ली की सीट पर वरिष्ठ भाजपा नेता विजय कुमार मल्होत्रा से मुक़ाबला कर रहे हैं. दिलचस्प वैसे इस बार का सबसे चर्चित मुक़ाबला चाँदनी चौक का है जहाँ कांग्रेस ने अपने प्रवक्ता कपिल सिब्ब्ल को मैदान में उतारा है तो उनके सामने हैं चर्चित टेलीविजन धारावाहिक 'सास भी कभी बहू थी' की तुलसी यानी स्मृति ईरानी.
माना जा रहा है कि तीस प्रतिशत से अधिक मुसलमान मतदाताओं वाली इस सीट पर शोएब इक़बाल के मैदान से बाहर रहने पर कांग्रेस को फ़ायदा हो सकता है. शोएब इक़बाल इस सीट पर जनता दल (एस) के उम्मीदवार हुआ करते थे. इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित के उम्मीदवार हो जाने से पूर्वी दिल्ली की सीट में भी मुक़ाबला दिलचस्प हो गया है. वहाँ उनके सामने तीन बार सांसद रह चुके भाजपा के लालबिहारी तिवारी हैं. नई दिल्ली सीट पर केंद्रीय मंत्री जगमोहन के सामने दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष अजय माकन हैं तो करोलबाग़ में भाजपा की अनीता आर्य के सामने दिल्ली की पूर्व मंत्री कृष्णा तीरथ. 1984 की लहर में कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सातों सीटें जीती थीं इसके बाद से वह कभी भी दो से अधिक सीटें नहीं जीत पाई है. इस तथ्य के बावजूद कि 1998 में दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस को ज़ोरदार जीत मिली थी, भाजपा ने 1999 में संसद की सातों सीटों पर क़ब्जा कर लिया था. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||