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'तुलसी' से मुक़ाबला है सिब्बल का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चांदनी चौक के फव्वारा चौक में स्मृति इरानी वोट माँग रही हैं और महिलाएँ फूल मालाएँ लिए उनका इंतज़ार करती नज़र आती हैं. वही स्मृति इरानी जो 'सास भी कभी बहू थी' की तुलसी वीरानी के नाम से ज़्यादा मशहूर हैं. वह लोक सभा चुनाव के लिए चांदनी चौक से भाजपा की उम्मीदवार हैं और महिलाओं को ख़ासा आकर्षित कर रही हैं. हमने स्मृति इरानी से पूछा कि उन्होंने अभिनय छोड़कर राजनीति में प्रवेश करने का फैसला क्यों किया तो उनका जवाब था, "भाजपा के सामाजिक संगठन की सदस्य पहले भी थी लेकिन पिछले साल राजनीतिक शाखा की सदस्य भी बन गई." ''मुझे लगता है कि जब आप अपने करियर के शीर्ष पर होते हैं तब आप सबसे ज़्यादा लोगों को प्रभावित कर सकते हैं. तब आप सबसे ज़्यादा लोगों की मदद कर सकते हैं. मैं इस समय अपने करियर के चरम पर हूँ तब मुझे योगदान देना चाहिए.'' तो क्या उन्हें उम्मीद है कि उनकी टीवी लोकप्रियता वोट में तब्दील होगी? तुलसी कहती हैं, "जहाँ तक लोगों की बात है चांदनी चौक के लोगों का दिल मैं जीत चुकी हूँ इसका मुझे पूरा विश्वास है.'' सिब्बल बेफ़िक्र स्मृति इरानी को चुनौती दे रहे हैं कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल.
1998 और 1999 में भाजपा के विजय गोयल इस क्षेत्र से जीते थे. इसके बावजूद कांग्रेस के कपिल सिब्बल इससे ज़्यादा चिंतित नहीं हैं. वे कहते हैं, ''पिछली बार की बात और थी, वो उम्मीदवार तो इस बार क्षेत्र छोड़कर ही भाग गया. इसका मतलब साफ़ है कि उसे पता था कि इस बार उनकी जीत होने वाली नहीं है.'' अपनी प्रतिद्वंद्वी तुलसी वीरानी यानी स्मृति इरानी के प्रति महिला मतदाताओं के रुझान को भी वे ज़्यादा गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, ''मुझे विश्वास है कि सभी लोग सोच-समझ कर वोट देंगे चाहे वो पुरुष हों या महिलाएँ.'' मुसलमानों के वोट माना ये जा रहा है कि इस बार फ़ैसला यहाँ के लगभग 37 प्रतिशत मुसलमान मतदाताओं के हाथों में है जो अब तक जनता दल (एस) के उम्मीदवार शोएब इक़बाल को वोट देते आए हैं. अब शोएब इक़बाल के मैदान से हटने के कारण क्या स्थिति बदली है?
हमने इस क्षेत्र के मुसलमान बहुल इलाक़ों में कुछ मतदाताओं से पूछा कि वो वोट किसको देंगे. अब्दुल रहमान कहते हैं कि शोएब इक़बाल के न रहने से मुसलमान तो कांग्रेस को ही वोट देने वाले हैं. मोहम्मद रिज़वान ने कहा, ''मुसलमान को रोटी भले न मिले लेकिन वो भाजपा को वोट नहीं देना चाहता.'' ग़ौर करने की बात है कि 1991 से अब तक हुए चार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से दो से ज़्यादा सीट कभी नहीं जीती हैं. दिल्ली की ये ख़ासियत रही है - कि पिछले 10 साल में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीती है पर वहीं पार्टी लोकसभा चुनाव को जीतने में नाकाम रही है - इसी कारण है ये टक्कर और भी दिलचस्प है. अब 13 मई को ही स्पष्ट होगा कि बल्लीमारान वाले चांदनी चौक के मतदाता अपने संसदीय क्षेत्र की चाबी बहू के हाथों में सौपते हैं या संसद में इस क्षेत्र की वकालत कपिल सिब्बल करेंगे. |
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