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इमाम बुखारी की अपील और उसका असर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी की चुनावी अपील से नया बखेड़ा खड़ा हो गया है. इमाम सैयद अहमद बुखारी ने हाल ही में भारत के मुसलमानों से अपील की है, कि वो संसदीय चुनाव में इस बार भारतीय जनता पार्टी के हक में वोट डालें. इतना ही नहीं उन्होंने भाजपा को पहली बार जामा मस्जिद चौक पर राजनीतिक सभा करने का अवसर दिया और बाक़ायदा उसमें शामिल होकर भाषण भी दिया. उनके रुख़ में आए इस बदलाव से मुसलमानों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई है और हालात ये हो गए हैं कि इस अपील के बाद पहली बार शुक्रवार को इमाम ने मीडिया से बात करने से इंकार कर दिया और कोई तक़रीर भी नहीं की. बयान अपने बयान में इमाम बुखारी ने कहा है कि दरअसल देश की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ नाम के लिए ही सेक्युलर हैं.
उन्होंने कहा, ''असल में आज़ादी के बाद से उन तक पार्टियों ने मुसलमानों के वोटों का फायदा उठाते हुए उनको वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है और अब वक्त आ गया है कि हम यानी कि मुसलमान इन पार्टियों को भी मौका दे जो कि गैर सेक्युलर (यानी कि भाजपा) मानी जाती हैं.'' इमाम बुखारी का बयान एक ऐसे वक्त आया है जब कि पिछले दो चरणों के मतदान के बाद की रिपोर्ट यह कहती हैं कि शायद इस बार एनडीए गठबंधन को बहुमत जुटाना मुश्किल हो. इससे पहले इमाम बुखारी के पिता, जामा मस्जिद के पूर्व इमाम अब्दुल्ला बुखारी भी इस तरह के बयान या फ़रमान जारी करते रहे थे. परंतु उस समय बात कुछ और थी और मुसलमानों ने अपने कांग्रेस विरोधी जज्बातों की वजह से जनता दल या समाजवादी पार्टी को वोट दिया था. लोगों की राय मिल्ली काँसिल के प्रवक्ता कमाल फारुखी की राय है कि ये बड़ी बदक़िस्मती की बात है कि जो इमाम बुखारी कल तक भाजपा और उसके नेताओं को कोसने में कोई कसर बाती नहीं रखते थे, वही आज भाजपा के हक़ में कसीदे गा रहे हैं. उनका कहना था कि इमाम बुखारी को इस अचनाक तब्दीली के लिए जो वजहें जिम्मेदार हैं उनका विवरण देना चाहिए. वैसे माना जाता है कि इमाम बुखारी के समर्थकों का फैलाव पुरानी दिल्ली के कुछेक महल्लों तक ही है. पुरानी दिल्ली के वासी और उच्चतम न्यायालय के वकील सलीम अखतर खान कहते हैं कि उन्हें इस अपील से बहुत अफसोस हुआ है. उनका कहना था, ''अहादीस और कुरान में भी इमामों को ऐसा कोई हक नहीं दिया गया है कि वो इस तरह के राजनीतिक बयान जारी करें और उनके अनुयायी उन्हें मानें.'' सवाल सवाल ये उठता है कि इमाम बुखारी की इस अपील का मुसलमान मतदाताओं पर कितना असर होगा? राष्ट्रीय एकता कौंसिल के अध्यक्ष जावेद हामीद का मानना है कि ये अपील रेगिस्तान में भटकती हुई आवाज की तरह होगी और उनके असर का अंदाजा चुनावी परिणामों के बाद सामने आ जाएगा. उनका मानना है कि मुसलमान मतदाता राजनीतिक रूप से बहुत सचेत है और इस तरह की अपीलों का उस पर कोई असर नहीं होगा. वैसे जामा मस्जिद के आसपास की प्रतिक्रिया से तो लगता है कि इमाम की अपील का कहीं उल्टा असर ही न हो जाए. |
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