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मुस्लिम मतदाता की क्या सोच है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय आम चुनावों में मुसलिम वोटों की अहम भूमिका रही है. 1967 में हुए आम चुनावों तक उत्तर भारत का आम मुसलिम मतदाता आमतौर पर कांग्रेस का समर्थक समझा जाता था लेकिन जब 1967 में ग़ैरकांग्रेसवाद की राजनीति शुरु हुई और मुसलमानों को भी विपक्ष में कांग्रेस का विकल्प दिखाई दिया तो उसने अपना रुख बदलना शुरु कर दिया.यही वजह है कि इस वर्ष उत्तर भारत के जिन 9 राज्यों में ग़ैरकांग्रेसी सरकारें बनीं उनमें मुसलिम मतदाताओं का भी एक रोल था. लेकिन 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद हुए हुए लोक सभा के मध्यावधि चुनावों में जब इंदिरा गांधी ने ग़रीबी हटाओ के नाम पर भारी बहुमत हासिल किया तो उसमें मुसलिम वोटों की भूमिका नगण्य हो गई, मगर जब 1977 में आपातकाल के बाद देश में आम चुनाव हुए तो सत्ता से श्रीमती इंदिरा गांधी का सफ़ाया करने में मुसलमानों ने भी पूरी शक्ति लगा दी. ख़ासकर उत्तर भारत में तो मुसलिम मतदाता लगभग इकतरफ़ा तौर पर जनता पार्टी के समर्थन में नज़र आते थे.
इन चुनावों के बाद उत्तर भारत में मुसलिम मतदाताओं का कांग्रेस से मोहभंग होता गया और चाहे वे 1984 के चुनाव हों 1989 के 1991 के या फिर बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद 1996 के चुनाव मुसलिम मतदाता देश भर में कांग्रेस से विमुख होते गए. सवालिया निशान? 1996 में केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन करवाने में भी मुसलिम मतदाताओं की अहम भूमिका थी लेकिन संयुक्त मोर्चा सरकार के गिरने के बाद और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद मुसलिम वोटों की प्रासंगिकता पर फिर सवालिया निशान लगने शुरु हो गए. 1998 में और 1999 में हुए चुनावों से तो यही संकेत मिलते हैं कि इन चुनावों में मुसलिम मतदाताओं की कोई ख़ास भूमिका नहीं रही. उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े आबादी वाले राज्य में भी जहां मुसलिम मतदाताओ की बड़ी तादाद है समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए मत विभाजन के कारण मुसलिम मतदाता कोई ख़ास प्रभाव नहीं बना पाए.
इस बार के चुनावों में मुसलमान मतदाता एक बार फिर चर्चा में हैं.दिलचस्प बात ये है कि अभी तक मुसलमानों की विरोधी समझी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने इन चुनावों में मुसलिम मतदाताओं को रिझाने की ज़ोरदार पहल की है और आरिफ़ बेग तथा आरिफ़ मुहम्मद ख़ां जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल करने के अलावा पार्टी दिल्ली की शाही मस्जिद के इमाम अहमद बुख़ारी का समर्थन हासिल करने में सफ़ल रही है. ख़ुद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कई चुनावी सभाओं में मुसलिम मतदाताओं से अपनी भारतीय जनता पार्टी और अपने गठबंधन के उम्मीदवारों को वोट देने की अपील कर चुके हैं. रुझान किधर होगा? लेकिन असली सवाल अभी भी ये बना हुआ है कि क्या मुसलिम मतदाता का झुकाव भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों की ओर होगा? और क्या कांग्रेस से उसकी दूरी कुछ कम हुई है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुस्लिम मतदाता गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में तो वह कांग्रेस को ही वोट देगा जहां उसका कोई विकल्प नहीं है लेकिन बिहार में वह राष्ट्रीय जनता दल या उसके गठबंधन वाले दलों का समर्थन करेगा और उत्तर प्रदेश में दर्जन भर सीटों को छोड़कर जहां कांग्रेस का प्रभाव है जैसे अमेठी, रायबरेली, सुल्तानपुर आदि वह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का समर्थन करने के लिए मजबूर होगा. जबकि पश्चिम बंगाल में मुसलिम मतदाताओं का झुकाव हमेशा की तरह वाम मोर्चा की ओर और आंध्र प्रदेश में दिलचस्प रुप से इस बार कांग्रेस के साथ रहने की संभावना है. ग़ौरतलब है कि आंध्र प्रदेश में मुसलिम मतदाता पिछले कई चुनावों से राज्य में सत्ताधारी तेलगू देशम का समर्थक रहा है लेकिन इस बार वह उससे कुछ ख़फा मालूम होता है. |
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