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दिलचस्प रहे राजस्थान के चुनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस बार राजस्थान के संसदीय चुनावों में वे सारे तत्व शामिल थे, जो भारतीय लोकतंत्र की जरूरी ख़ुराक बन चुके हैं. गत 5 मई को संपन्न सभी 25 लोकसभा सीटों के चुनावों में धनबल, जाति-बिरादरी और धर्म का इस्तेमाल तो था ही, साथ ही मतदाताओं के लिए शराब और अफ़ीम के सेवन का अवसर भी मौजूद था. चुनाव के दिन खोली गई शराब ने राज्य के भीलवाडा संसदीय क्षेत्र में पाँच लोगों को मौत की नींद सुला दिया. जयपुर में मतदान से ठीक एक दिन पहले 14 लाख रुपए की शराब पकड़ी गई. वहीं पश्चिमी राजस्थान में मतदाताओं को लुभाने के लिए अफीम उपलब्ध कराई गई. फ़ीलगुड ग़ायब इन चुनावों में ज़बर्दस्त प्रचार के बावजूद ‘भारत उदय’ और ‘फील गुड’ का प्रभाव कहीं दिखाई नहीं दिया.
हालाँकि भाजपा का दावा था कि फीलगुड के कारण मतदाताओं में अपूर्व उत्साह रहेगा लेकिन जब वोट डालने की घड़ी आई तो राज्य के साढ़े तीन करोड़ से अधिक मतदाताओं में से महज 49 प्रतिशत लोग ही मतदान केन्द्रों तक पहुँचे. 1999 के चुनावों में 53 फ़ीसदी लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया जबकि तब फीलगुड भी नहीं था. यह मतदाता की उदासी ही थी कि राज्य के 33 गाँवों में लोगों ने बिजली, सड़क, पानी जैसी दैनिक समस्याओं पर मतदान का बायकाट किया. राज्य की 25 सीटों के लिए 125 प्रत्याशी मैदान में थे. इनमें बहुजन समाज पार्टी के 24 प्रत्याशी भी शामिल हैं. लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी पार्टी के लिए तीन बार दौरा किया और चार सभाएँ संबोधित की जबकि कांग्रेस की सिरमौर प्रचारक सोनिया गाँधी ने राज्य को एक दिन ही दिया. इनके अलावा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उड़नखटोले में धूम-धूमकर प्रचार कर रही थी. पर कांग्रेस में कल तक नम्बर वन मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत को उनकी पार्टी ने हाशिए पर रखा. हालाँकि वे अपने दम पर कई चुनाव क्षेत्रों में घूमे और जयपुर में रोड शो किया. नई पीढ़ी इन चुनावों में राजनेताओं ने अपनी नई पीढ़ी को भी चुनावी अखाड़े में उतारा. केन्द्रीय वित्तमंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह बाडमेर से, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुश्यंत सिंह अपनी माँ की सीट झालावाड़ से और सचिन पायलट अपने पिता राजेश पायलट की मशाल लिए पैतृक सीट दौसा से किस्मत आजमा रहे हैं. उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के भतीजे प्रताप सिंह जयपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद में जाने का प्रयास कर रहे थे. बीकानेर के चुनावी दँगल में बॉलीवुड के हीमैन, धर्मेंद्र के आ जाने से वहाँ मुकाबला रोचक हो गया था. शुरु में मजबूत दिख रहे धर्मेंद्र को चुनावी वैतरणी पार करने की कवायद में अपने बेटे सनी और बॉबी देओल की मदद लेनी पड़ी.
जालौर में भी चुनावी तस्वीर दिलचस्प रही जहाँ पूर्व केन्द्रीयमंत्री बूटा सिंह के सामने भाजपा ने पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बँगारू लक्ष्मण की पत्नी सुशीला को उतार दिया. प्रेक्षकों की नज़रें सीकर, सवाई माधोपुर और टोंक पर भी लगी है जहाँ एनडीए सरकार के तीन मंत्री सुभाष महकिया, जसकौर मीणा और कैलाश मेधवाल फिर चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा चूरू से बलराम जाखड़ और उदयपुर से गिरिजा व्यास भी चुनाव मैदान में हैं. इन चुनावों को राजा-महाराजाओं की सियासत में बढ़ती दिलचस्पी के लिए भी याद किया जाएगा. राज्य के अनेक पूर्व राजघराने, भाजपा के पक्ष में प्रचार करते दिखाई दिए. भरतपुर के पूर्व राजा विश्वेन्द्र सिंह फिर भाजपा से चुनाव मैदान में थे तो गायत्री देवी ने भाजपा के पक्ष में अपील जारी की. इसके अलावा अनेक पूर्व सामंत भाजपा के पक्ष में सक्रिय रहे. समीकरण राज्य में अनेक सीटों पर कांग्रेस का जाट-मुस्लिम गठबंधन टूटता हुआ नज़र आया. कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य अबरार अहमद को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर इसकी भरपाई का प्रयास किया लेकिन श्री अबरार की मतदान से एक दिन पूर्व सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. इससे कांग्रेस को गहरा झटका लगा. भाजपा ने अपने पक्ष में अनेक जातीय-संगठनों की अपील प्रकाशित करवाई और कई पीर, मुल्ला-मौलवियों ने भी ‘हे परवरदिगार, कमल से पहली बार हुआ प्यार’ का विज्ञापन भी छपवाया. इनमें अजमेर की पवित्र दरगाह के दीवान जैनुल अबेदीन का नाम भी शामिल था. बाद में अबेदीन ने इस पर आपत्ति करते हुए भाजपा को कानूनी नोटिस भी भेजा. |
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