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राजस्थान: अब बाहरी उम्मीदवारों का भरोसा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में कभी बाहरी उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी ही अब ऐसे उम्मीदवारों का सहारा ले रही है वहीं इस परंपरा को शुरू करने वाली कांग्रेस आज इसका विरोध कर रही है. भाजपा धर्मेन्द्र जैसे प्रत्याशियों को लेकर चुनाव मैदान में हैं मगर कांग्रेस को ये रास नहीं आ रहा है. 1980 में राजेश पायलट के आने के बाद कांग्रेस के दिग्गज नेता बलराम जाखड़ और बूटा सिंह ने भी राजस्थान को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया. बाद में देवीलाल, अजय चौटाला और हरियाणा के नेता तय्यब हुसैन ने भी राजस्थान से विधानसभा का चुनाव जीता. बाहरी प्रत्याशियों का 'प्रयोग' कांग्रेस ने शुरु किया था पर अब राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष नारायण सिंह कहते हैं कि भाजपा के पास राज्य में उम्मीदवारों की कमी पड़ गई हैं और इसीलिए वो बाहरी प्रत्याशी उतार रहे हैं. नारायण सिंह ने कहा, ‘‘भाजपा के पास उम्मीदवार नहीं हैं, वो बीकानेर में एक फिल्म स्टार को लाए हैं. धर्मेन्द्र फिल्मों के सुपर स्टार हो सकते हैं लेकिन राजनीति में तो वह ‘क’ ही नहीं जानते.’’ कभी भाजपा के प्रभावी नेता रहे भैरोसिंह शेखावत ने राजस्थान में कांग्रेस के बाहरी उम्मीदवार लाने को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था कि राजस्थान को चारागाह नहीं बनने देंगे. पर अब, भाजपा भी दूसरे राज्यों से लाए गए प्रत्याशियों के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछा रही है. भाजपा ने बाहरी उम्मीदवारों का सहारा लिया है. विरोध में आवाज़ें भी उठीं लेकिन भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने इसे उचित बताते हुए कहा कि ‘‘राजनीतिक दृष्टि से ये बात तो बिल्कुल ठीक है कि स्थानीय रूप से ही यदि जीतने वाले और टिकने वाले प्रत्याशी उपलब्ध हैं तो प्राथमिकता उनको देनी चाहिए लेकिन देश की राजनीति में जिस तरह का उफ़ान और ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है, उसमें चुनावी परिणाम लाने के लिए कुछ बाहरी प्रत्याशियों को हमने टिकट दिया.’’ भावपूर्ण अपीलों और बड़े-बड़े वादों के साथ कई नए राजनीतिक चेहरे राजस्थान आए, अपना राजनीतिक भविष्य सँवारा और यहीं स्थापित हो गए. कुछ ऐसे भी थे जो चुनाव जीते लेकिन फिर पलटकर अपना मुंह नहीं दिखाया. |
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