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महफ़िले अफ़ीम से चढ़ता है चुनावी ख़ुमार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र में आज भी वोट का फ़ैसला मुद्दे, विचार या विवेक से नहीं, बल्कि गाँव की चौपाल पर सजने वाली महफ़िले अफ़ीम में होता है. ऐसी ही एक महफ़िल में हम भी शरीक हुए. स्थानीय लोग इसे रियाज़ या मनुहार कहते हैं. बाड़मेर ज़िले के इस गाँव की चौपाल पर महफ़िल जमी और प्रारंभिक अभिवादन के बाद अफ़ीम को तरल पदार्थ के रूप में सेवन योग्य बनाने का काम प्रारंभ हुआ. इसमें सैंकड़ो साल पुराने उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं. फिर शुरू हुआ मान मनुहार का दौर और लोग अंजलि भर अफ़ीम का रस्सावादन करने लगे. गाँव के लोगों ने बताया कि चुनावों में रियाज़ या अफ़ीम के सेवन का यह दौर बढ़ जाता है. लेंगरा गांव के पदम सिंह कहते हैं, "चुनावों में कई क्विंटल अफ़ीम काम में ली जाती है. लोग मिलते हैं, रियाज़ में इसका सेवन करते और चुनावी चर्चा की जाती है." पुरानी लत सदियों से थार मरूस्थल के इन गाँवों में लोग शादी, विवाह, दुख, शोक, जीत-हार या सामाजिक उत्सवों में अफ़ीम का सेवन करते रहे हैं. लेंगरा गांव के हेमपुरी बचपन से ही ऐसे आयोजन देख रहे हैं. वे कहने लगे हैं मैं साठ वर्ष से ऐसे आयोजन देख रहा हूं. यह एक परंपारा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. रियासती दौर में सैनिक युद्ध अभियानों में अफ़ीम का सेवन कर पढ़ाई करते थे. गाँव के लोग जानते हैं कि यह एक सामाजिक बुराई है और अफ़ीम का नशे में सेवन ग़ैर क़ानूनी है. गांव के गोरधन सिंह कहते हैं, "अफ़ीम दुश्मनी को दोस्ती में बदल देती है. ऐसी महफ़िलों में अफ़ीम आपसी विवाद निबटाने, शादी-विवाह के रिश्ते तय करने और शत्रुता भूलाने के काम आती है. " पश्चिमी राजस्थान में कभी भी अफ़ीम की खेती नहीं की जाती है. ख़्याल है कि यह अफ़ीम राजस्थान के दक्षिणी पूर्वी कोटा संभाग से चोरी छिपे लाई जाती है. चुनावी रंग नरपत सिंह युवा पीढ़ी के हैं. वे कहते हैं कि यह अफ़ीम लोगों को एकत्रित करने में सहायता करती है. लोग एक स्थान पर जमा होकर एक दूसरे से मिलते हैं.
गोरधन सिंह अफ़ीम के शारीरिक-मानसिक नुक़सान के बारे में बखूबी जानते हैं. अनेक लोक कवियों ने अपनी कविताओं से अफ़ीम के नशे की बुराई पर प्रहार किया है. बाड़मेर के दीपपुरी गोस्वामी उन लोगों में से हैं जो अफ़ीम के विरुद्ध अभियान चलाते रहे हैं. गोस्वामी मानते हैं कि चुनाव में क्विंटलों अफ़ीम स्वाहा की जाती है, इसमें कोई भी दल पीछे नहीं है. प्रत्येक बूथ के लिए आधा किलोग्राम अफ़ीम दी जाती है. नेम सिंह कहते हैं चुनावी काम तभी आगे बढ़ता है जब अफ़ीम उपलब्ध हो जाए. जोधपुर स्थित माणकलाव अफ़ीम मुक्ति ट्रस्ट अब तक 75 हज़ार लोगों को इस व्यसन से मुक्ति दिला चुका है. पांच साल सपने बेच चुके नेता जब धरातल पर अपने विकास के दावों को निरा खोखला पाते हैं तो फिर अफ़ीम ही मतदाताओं का ईमान डिगाने में हथियार बनती है. अंजलि भर अफ़ीम वोटिंग मशीन पर मनचाहा बटन दबवाने में नेताओं की मदद करती है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की भला इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी. |
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