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बिहार में एनडीए को नुक़सान के आसार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार की कुल 40 लोकसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान सम्पन्न हुए. इस दौरान हिंसा कम हुई लेकिन धांधली में कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती. जहां जिसे बूथ कब्जा का मौका मिला, वहां उसने ‘जनमत’ को ‘लूटमत’ में बदल दिया. फिर भी, पलड़ा तो जनरूझान का ही भारी रहता है और इस बार भी रहा. निजी चुनावी लाभ के लिए निर्लज्ज भाव से दल-बदल की होड़ इस बार यहां कुछ ज़्यादा ही मची. ‘कल के दुश्मन, आज के दोस्त’ वाले गठबंधन हुए, फिर भी लालू-विरोध या लालू-समर्थन के इर्द-गिर्द ही बिहार की चुनावी राजनीति घूमती रही. रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल की नयी दोस्ती को इन दोनों दलों के समर्थकों ने बहुत उत्साह के साथ नहीं स्वीकारा. लालू-राबड़ी राज के साझीदार बिहारी कांग्रेसी नेता भी लालू-रामविलास गठजोड़ के प्रति खिंचे-खिंचे रहे. उधर भारतीय जनता पार्टी के मुखर विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रत्याशी बन गए. आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रसंग सबसे ज्यादा आगे बढ़कर लोकजनशक्ति पार्टी ने विवादास्पद और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपने साथ लेकर उन्हें चुनावी टिकट दिया.
बलिया लोकसभा क्षेत्र से सूरजभान सिंह और पूर्णिया संसदीय क्षेत्र से राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव इनमें प्रमुख हैं. जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने वालों में पप्पू यादव के अलावा रणवीर सेना के कथित सरगना बरमेश्वर मुखिया आरा से, राजन तिवारी बेतिया से और मोहम्मद शहाबुद्दीन सीवान से प्रत्याशी हैं. इसी संदर्भ में पटना उच्च न्यायालय ने सवाल उठाया है कि क़ानूनन मताधिकार से वंचित ये विचाराधीन कैदी विधायक या सांसद पद के उम्मीदवार कैसे हो सकते है? इस मसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने फ़िलहाल रोक तो लगा दी है लेकिन यह सवाल बड़ा है कि जिन लोगों को मतदान का अधिकार नहीं है उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए कि नहीं.
राज्य के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में हुए मतदान का जायज़ा लेने के क्रम में मैंने देखा कि बड़ी तादाद में मतदान केन्द्र असामाजिक तत्वों के कब्जे में थे. ऐसे बूथों पर केन्द्रीय बल के नहीं, सिर्फ ज़िला पुलिस और होमगार्ड के ढीले-ढाले जवान तैनात थे. जो दबंग बूथ लुटेरों के आगे प्रभावहीन नजर आ रहे थे. मैंने अपने भ्रमण के दायरे में आने वाले प्रायः हरेक मतदान केन्द्र पर देखा कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने की शिकायतें लेकर कई लोग परेशान थे. दूसरी बड़ी समस्या थी वोटिंग मशीन की ख़राबी और मशीन पर सही जगह बटन दबाने का तरीक़ा नहीं जानने वाले मतदाताओं की मुश्किल. किसी ग्रामीण अनपढ़ महिला-पुरुष मतदाता को समझाने के लिए वोटिंग मशीन तक जा पहुंचे, कुछ पुलिसकर्मी कैमरे की पकड़ में आ जाने से विवादास्पद बन गए. राजनीतिक पहलू राज्य में जो विश्लेषण हो रहा है, उसके मुताबिक राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में यहां कुछ अधिक सीटें हासिल हो जाने की संभावना बताई गई है.
यानी कुल चालीस सीटों में कम से कम पन्द्रह पर इस गठबंधन की पकड़ मजबूत हो जाने का आकलन है. उल्लेखनीय है कि गत लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन को दस और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को तीस सीटें मिली थीं. लालू प्रसाद यादव ने यहां कांग्रेस को मात्र चार सीटों का साझीदार बनाया और माना जा रहा है कि इनमें से तीन (सासाराम, औरंगाबाद और मधुबनी) में कांग्रेस के जीतने की पूरी संभावना है. भागलपुर की सीट मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से छिन जाने की आशंका यहां राष्ट्रीय जनता दल खेमे में भी व्यक्त की जा रही है. वहां भारती जनता पार्टी के सुशील कुमार मोदी की जीत को प्रेक्षकों ने प्रायः तय मान लिया. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दो-दो संसदीय क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं. छपरा और मधेपुरा में से किसी एक पर लालू को और बाढ़ तथा नालंदा में से किसी एक पर नीतीश कुमार को जीत हासिल होने की संभावना ज़्यादा है. चुनावी हिंसा यदि पिछले लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो इस बार बिहार के संसदीय चुनाव को शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा. गत चुनाव के दौरान हुई हिंसक वारदातों में कुल चालीस लोग मारे गए थे. इस बार ये संख्या सिर्फ छह तक सीमित रही.लेकिन, मतदान के दौरान बमों और गोलियों का इस बार भी कई क्षेत्रों में खुलकर इस्तेमाल हुआ. दर्जनों लोग घायल हुए. खासकर छपरा और मुंगेर में हिंसक झड़पें ज्यादा हुईं. |
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