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समाजवादी पार्टी की सीटें दाँव पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में लोकसभा की जिन तीस सीटों के लिए पांच मई को वोट डाले जा रहे हैं उनमें से भारतीय जनता पार्टी ने 1999 में सात सीटें जीती थीं जबकि एक सीट हरदोई भाजपा समर्थित उम्मीदवार को मिली थी. पन्द्रह अन्य सीटों पर भाजपा का स्थान दूसरा था. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी को तीस में से तेरह और बहुजन समाज पार्टी को सात सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार दो सीटों पर विजयी हुए थे. पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हालत और पतली हुई थी और वो सिर्फ चार लोकसभा क्षेत्रों में अन्य पार्टियों पर भारी पड़ी थी. समाजवादी पार्टी 14, बहुजन समाज पार्टी ग्यारह और कांग्रेस 1 सीट पर अपने प्रतिद्वंदियों से आगे थी. पिछले लोकसभा चुनाव और इस बार के चुनाव में हालात सिर्फ ये बदले हैं कि तब कल्याण सिंह बहुत सक्रिय न रहकर एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ काम कर रहे थे और इस बार समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ रहे अजीत सिंह उस समय कांग्रेस के साथ थे. लखनऊ में भी चुनाव भारतीय जनता पार्टी के तीन बड़े नेताओं में से दो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मानव संसाधन मंत्री डाक्टर मुरली मनोहर जोशी लखनऊ और इलाहाबाद से चुनाव लड़ रहे हैं.
जबकि प्रदेश पार्टी अध्यक्ष विनय कटियार इस बार फैजाबाद के स्थान पर लखीमपुर खीरी से चुनाव लड़ रहे हैं. कानपुर से प्रदेश उपाध्यक्ष सत्यदेव पचौरी मैदान में हैं तो शाहाबाद से एक दूसरे उपाध्यक्ष सत्यदेव सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. उधर यादव बेल्ट में मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं तो उनके पुत्र अखिलेश कन्नौज से एक बार फिर लोकसभा में पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. राज बब्बर आगरा से और रामजी लाल सुमन फिरोजाबाद से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं. इन तीस सीटों पर यादव, ठाकुर, जाट, कुर्मी, लोध और मुसलमान मतदाताओं की बहुतायत है. वर्तमान परिस्थितियों में यादव और जाट ठाकुरों और मुसलमानों का एक वर्ग मुलायम सिंह यादव के साथ जाता दिख रहा है. कुर्मियों का वोट समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और अपना दल में बराबर बंटने की संभावना है. कल्याण सिंह के बल बूते लोध वोट भारतीय जनता पार्टी को जा रहे हैं, हाँलांकि साक्षी महाराज जैसे लोग उसमें भी विभाजन करने की कोशिश कर रहे हैं. मुसमानों का वोट ऐसा लगता है कि मुसलमानों ने इस बार अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग पार्टियों को वोट देने का फैसला किया है और मुलायम सिंह की लाख कोशिशों के बावजूद उनकी बहुत बड़ी तादाद कांग्रेस को वोट देने जा रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के कैंप में इस पर चिंता है वहीं भारतीय जनता पार्टी इस माहौल को हवा देने की कोशिश कर रही है क्योंकि मुस्लिम वोटों में जितना विभाजन होगा- भारतीय जनता पार्टी को उतना ही फायदा होगा. आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस को मुसलमानों का अच्छा खासा समर्थन मिलने के बावजूद उनकी सीटों में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है. बहरहाल भारतीय जनता पार्टी पहले दौर में हुए नुकसान की भरपाई इन सीटों पर करने की कोशिश कर रही है- इसलिए पार्टी के सभी बड़े नेता इन इलाकों में चुनाव प्रचार कर रहे हैं, दूसरी तरफ मुलायम एक तरह से अपने गढ़ में कुछ और सीटें बढ़ा पाने की फिराक में हैं. इनमें बहुजन समाज पार्टी को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. 1999 के चुनाव में पांच सीटें उन्होंने यहां से निकाली थी और इस बार इन सीटों में बढ़ोत्तरी ही होने जा रही है कमी नहीं. |
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