| झारखंड: भाजपा को झटके की संभावना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लगभग एक करोड़ सत्तर लाख मतदाता वाले भारतीय राज्य झारखंड के कुल चौदह लोकसभा क्षेत्रों की जो आरंभिक चुनावी तस्वीर उभरी है, वो भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं है. भंग लोकसभा की ग्यारह सीटों पर झारखंड के भाजपा प्रतिनिधियों का कब्जा था और अब इस राज्य में घूमते हुए मैंने इस दल के ही लोगों को ये कहते हुए ‘ऑन रिकॉर्ड’ सुना है कि यहां भाजपा की सीटें घटने की आशंका है. इस राज्य में जनजातीय राजनीति के जानकार और भाजपा से जुड़े हुए प्रोफ़ेसर दिवाकर भिंज ने बीबीसी से कहा कि इस राज्य की चौदह में से उन पाँच लोकसभा सीटों पर उनकी पार्टी (भाजपा) पिछड़ती हुई दिख रही है, जिन पर पिछले चुनाव में आसानी से जीत हुई थी. इसका कारण उन्होंने अपने उन सांसदों की खराब हो चुकी जन छवि को माना. हो सकता है नुक़सान भारतीय जनता पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले झारखंड में इस बार पलामू, लोहरदग्गा, चाइबासा, चतरा, धनबाद और गिरीडीह लोकसभा क्षेत्रों में गैर बीजेपी दलों की उम्मीदें बहुत बढ़ी हैं.
उधर दुमका और राजमहल में तो पहले से ही बीजेपी को निराशा मिलती रही है. तो क्या इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के गठजोड़ और भाजपा से बिदके जनता दल (यूनाइटेड) का कोई मिला जुला प्रहार यहां ‘कमल’ को पूरी तरह खिलने से रोक सकेगा? टीकाकार बताते हैं कि ऐसा तभी संभव होगा, जब झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के साथ-साथ वामपंथी दलों के नेता भी सही मायने में मोर्चा बनाएंगे और जब ग़ैर भाजपा मतों का बिखराव नहीं होगा. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ‘कोडरमा’ से, झारखंड विधानसभा का अध्यक्ष पद छोड़ चुके इंदर सिंह नामधारी ‘चतरा’ से, केन्द्रीय मंत्री कड़िया मुंडा ‘खूंटी’ से, विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा ‘हज़ारीबाग’ से और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबु सोरेन ‘दुमका’ से चुनाव लड़ रहे हैं. इन सब की चुनावी संभावनाएँ बेहतर बताने वाले प्रेक्षकों की तादाद यहाँ ज्यादा है. लेकिन, मुझे कई ऐसे तटस्थ दिखने वाले आम मतदाता भी झारखंड में मिले, जो किसी दल या किसी उम्मीदवार को ध्यान में रखे बगैर केन्द्र की मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का ‘टिकाऊ विकल्प’ नहीं होने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी की तरफ अपना सम्मान बता रहे थे. |
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