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गुरुवार, 04 मार्च, 2004 को 19:23 GMT तक के समाचार
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ये बिहार है सर!

बीबीसी श्रोताओं के साथ शिवकांत
ये बिहार है सर!
कहने को हमने बिहार के पहले चरण में राज्य के पश्चिमोत्तर कोने भर की यात्रा की, जिसमें सारण, चंपारण और सीतामढ़ी के इलाक़े आते हैं.

लेकिन ज्यों ही हमारी गाड़ी ने हाजीपुर के पास पटना-मुज़फ़्फ़रपुर राजमार्ग को छोड़ सोनपुर और छपरा की तरफ़ मुँह किया, समय मानो ठहर सा गया.

सड़क ने कुछ-कुछ मंगल ग्रह की सतह जैसी बनावट इख़्तियार कर ली.

हर क़दम पर फ़ुट दो फ़ुट गहरे गड्ढे, टायरों से पिस-पिस कर बनी बादामी भूरे रंग की धूल और घिस-घिस कर नुकीले बने पत्थर.

माल से लदे ट्रक, सवारियों से लदी बसें और धूल से लदी कारें इन्हीं तथाकथित सड़कों पर बल खाते साँप की तरह एक अजीब सी लय में रेंगने लगीं और हमें लगने लगा कि जैसे हम कार की बजाए किसी ऐसे यान में फँस गए हों जो धरती नहीं बल्कि मंगल ग्रह के तूफ़ान में डगमगा रहा हो.

हाजीपुर से छपरा, छपरा से सीवान, सीवान से मोतीहारी और मुज़फ़्फ़रपुर से सीतामढ़ी को जोड़ने वाली सड़कों में से अधिकांश की हालत तंज़ानिया के उत्तरी शहर अरूशा से सेरेंगेटी के विश्वप्रसिद्ध मैदानों तक जाने वाले उन कच्चे रास्तों जैसी थी जो रिफ़्ट घाटी से होकर जाते हैं.

रिफ़्ट घाटी वो जगह है जहाँ से लाखों वर्ष पहले अफ़्रीका महाद्वीप का पूर्वी हिस्सा टूट कर अलग होने लगा था. इसलिए वहाँ आज भी प्रकृति अपने लाखों वर्ष पुराने रूप में है. समय मानो वहाँ ठहर सा गया है.

बिहार की इन सड़कों की हालत रिफ़्ट घाटी के उबड़-खाबड़ रास्तों से भी ख़राब है और प्रधानमंत्री की स्वर्ण चतुर्भुज योजना यहाँ तक पहुँच भी पाएगी, इसमें संदेह है.

बिहार के ऊबड़ खाबड़ रास्ते
राह कठिन तो है मगर...

फिर भी ज़िन्दगी है कि चले जा रही है. व्यापार भी चल रहा है और यात्राएँ भी.

भँवर में फँसी नाव की तरह डगमगाती हुई हमारी गाड़ी भी चल ही रही थी.

लेकिन मन में कई सवाल भी उठ रहे थे. मसलन, इन बदहाल सड़कों की वजह से कितने काम के घंटे और दिन बरबाद हो रहे होंगे? कितने लोग इन सड़कों की धूल और देरी से होने वाले तनाव की वजह से बीमारियों का शिकार बनते होंगे? कितनी गाड़ियाँ और टायर समय से पहले ही इन सड़कों पर ढेर होते होंगे? इनका बिहार जैसे विपन्न राज्य की उत्पादकता पर क्या असर पड़ता होगा?

इन सवालों का जवाब माँगने पर बिहार के नेता आरोपों का फ़ुटबॉल खेलने लगते हैं.

और लोग ठीक उसी तरह ख़राब सड़कों की दास्तान सुनाने लगते हैं जैसे इंगलैंड के लोग ख़राब मौसम की.

लेकिन कुछ देर बाद अक्सर एक अजीब सी मुस्कान के साथ एक जाना पहचाना फ़िकरा भी सुनने को मिल जाता है, "ये बिहार है सर".

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