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शांति प्रक्रिया खतरे में : एलटीटीई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों ने कहा है कि राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के संसद भंग करके चुनाव करवाने के फ़ैसले से शांति प्रक्रिया को नुक़सान होगा. शनिवार को श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने अचानक संसद भंग करके चुनाव की घोषणा कर दी थी. 225 सदस्यों वाली श्रीलंका की संसद के लिए दो अप्रैल को मत डाले जाएँगे. तमिल विद्रोहियों का कहना है कि श्रीलंका में जिस तरह की राजनीतिक अस्थिरता है उसके चलते शांति प्रक्रिया ख़तरे में पड़ गई है. तमिल विद्रोहियों का समर्थन करने वाले एक वेबसाइट से चर्चा करते हुए विद्रोहियों के एक बड़े नेता और शांति प्रक्रिया में भागीदार रहे एंटन बालासिंधम ने कहा है कि एलटीटीई शांति के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन यदि शांति के प्रयास विफल होते हैं तो तमिल विद्रोही राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं. बालासिंघम ने कहा है, ''राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सत्ता की लड़ाई ज़रुरत से ज़्यादा बढ़ गई है और वे इस लड़ाई में श्रीलंका की सबसे बड़े मुद्दे को हल करने के प्रति इच्छाशक्ति खो चुके हैं.'' उन्होंने गृहयुद्ध को श्रीलंका का सबसे बड़ा मुद्दा बताया है. हाल के हफ़्तों में तमिल विद्रोहियों ने कई बार चेतावनी दी है कि शांति प्रक्रिया ख़तरे में है. बीबीसी संवाददाता फ़्रांसिस हैरिसन का कहना है कि सबसे आशावादी स्थिति यही है कि नई सरकार के गठन के बाद शांति वार्ता फिर शुरु हो जाएगी. लेकिन सच यह भी है कि यदि प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की पार्टी को बहुमत मिल जाता है तो राजनीतिक खींचतान चलती ही रहेगी क्योंकि राष्ट्रपति कुमारतुंगा का कार्यकाल अभी बचा हुआ है. और यदि राष्ट्रपति की पार्टी जीतती है तो उन्होंने पुराने कम्युनिस्ट नेताओं के साथ एक नया मंच बना ही लिया है जो तमिल विद्रोहियों को स्वायत्ता देने का विरोध करता है. उल्लेखनीय है कि स्वायत्तता तमिल विद्रोहियों की प्राथमिक शर्तों में से एक है. हालांकि तमिल विद्रोही कह रहे हैं कि वे किसी भी राजनीतिक दल के साथ शांति पर चर्चा कर सकते हैं. अनबन श्रीलंका में दिसंबर 2001 के चुनाव के बाद से ही राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच अनबन चल रही थी. राष्ट्रपति कुमारतुंगा की पार्टी पीपुल्स एलायंस को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. पिछले साल के अंत में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच राजनीतिक मतभेद चरम सीमा पर पहुँच गए. नवंबर महीने में राष्ट्रपति ने विक्रमसिंघे सरकार के रक्षा, गृह और सूचना मंत्री को बर्ख़ास्त कर दिया था. इसके बाद से दोनों के बीच सत्ता की खींचतान बढ़ी ही है. |
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