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बुधवार, 17 दिसंबर, 2003 को 16:25 GMT तक के समाचार
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पिछले हमले में कैसे बचे मुशर्रफ़?

परवेज़ मुशर्रफ़
मुशर्रफ़ पर पहले भी जानलेवा हमले हुए हैं

पिछली बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के क़ाफ़िले को बम से उड़ाने की कोशिश के बारे में दिलचस्प जानकारियाँ सामने आईं हैं.

अधिकारियों का कहना है कि परवेज़ मुशर्रफ़ शायद रेडियो जैमिंग उपकरण के कारण बच गए.

अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा के लिए इस उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है, यह उपकरण सभी रिमोट सिग्नलों को बेकार कर देता है इसलिए जब उनका क़ाफ़िला गुज़र रहा था ठीक उसी समय बम का धमाका करना असंभव था.

भारत में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की एक बम धमाके में मौत होने के बाद हुई जाँच में यही पता चला था कि अगर जैमिंग उपकरण होते तो उनकी जान बच जाती.

रविवार को रावलपिंडी के करीब एक पुल पर लगातार पाँच बम धमाके हुए थे, ये धमाके मुशर्रफ़ की गाड़ी के गुज़र जाने के कुछ ही सेकेंड बाद हुए थे.

पिछले वर्ष भी पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर जानलेवा हमला हुआ था लेकिन वे बाल-बाल बच गए थे.

पिछले साल उन पर हुए हमले के बाद से उनकी सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व रूप से कड़ी कर दी गई थी, वैसे भी अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी कार्रवाई शुरू होने के बाद से उसे और चुस्त बनाया गया है.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने ख़ुद ही कहा था कि इस हमले के पीछे इस्लामी चरमपंथियों का हाथ है.

परवेज़ मुशर्रफ़ के क़ाफ़िले में हमेशा एक जैसी कई गाड़ियाँ होती हैं और यह पता कर पाना बहुत मुश्किल है कि वे ख़ुद किस गाड़ी में हैं.

जिन कार्यक्रमों में वे शामिल होते हैं वहाँ मोबाइल फ़ोनों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होती और हाल ही में रेडियो सिग्नल जैमिंग उपकरण का प्रयोग भी शुरू हुआ है.

गिरफ़्तारियाँ

इस बीच राष्ट्रपति मुशर्रफ़ पर हमले के सिलसिले में रावलपिंडी के आसपास के इलाक़ों के 20 लोगों से पूछताछ की गई है.

इनमें से घटनास्थल के पास की एक मस्जिद के इमाम और कई अफ़ग़ान शरणार्थी शामिल हैं.

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पुल पर जिस तरह से विस्फोटक लगाए गए थे और उनके धमाके के लिए जो तकनीक इस्तेमाल की गई थी उसे कोई बहुत प्रशिक्षित व्यक्ति अंज़ाम दे सकता था.

अधिकारियों को शक है कि इस तरह के उपकरण और प्रशिक्षण अल क़ायदा के ही बस की बात है लेकिन अभी तक अधिकारी खुलकर कुछ भी कहने से परहेज़ कर रहे हैं.

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