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चुनावी सर्वेक्षणों में अलग-अलग तस्वीर
भारत में चुनाव का मौसम हो तो सर्वेक्षणों की बाढ़ सी आ जाती है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से लेकर एग्ज़िट पोल सर्वेक्षण तक एक के बाद एक सर्वेक्षण जो वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं मगर उनसे एक सी तस्वीर उभरती नहीं दिखती. ऐसा लगता है कि एक के साथ एक मुफ़्त नहीं बल्कि एक चुनाव के साथ कई सर्वेक्षण मुफ़्त बँट रहे हों. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में हो रहे चुनाव से पहले अब तक कम से कम सात सर्वेक्षण हुए हैं और मतदान के बाद भी इतने ही सर्वेक्षणों की संभावना है. यह भी संभव है कि इन सर्वेक्षणों में से किसी न किसी की भविष्यवाणी ठीक हो ही जाएगी. सर्वेक्षणों की झड़ी इंडिया टुडे-ओआरजी के सर्वेक्षण ने मध्य प्रदेश छोड़कर बाक़ी तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनने की भविष्यवाणी की है.
आउटलुक-एसी नेल्सन के सर्वेक्षण ने राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस को और मध्य प्रदेश में भाजपा को स्पष्ट जीत की ओर बढ़ते बताया है. मगर छत्तीसगढ़ के लिए उसने दोनों ही दलों को बराबर-बराबर सीटें दी हैं. ज़ीन्यूज़ ने सीवोटर के साथ मिलकर सर्वेक्षण कराए और उन्होंने भी मध्य प्रदेश को छोड़कर बाक़ी तीनों राज्यों में कांग्रेस को बहुमत मिलने की बात कही है. द वीक के सर्वेक्षण ने राजस्थान और दिल्ली तो कांग्रेस की झोली में डाला है मगर मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ को भाजपा के हिस्से में जाता बताया है.
सहारा समय और डीआरएस के सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति दिख रही है जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा को जीत मिलेगी. उन्होंने छत्तीसगढ़ और दिल्ली को कांग्रेस के हाथों में जाता दिखाया है. एक अन्य एजेंसी सीफ़ोर की भविष्यवाणी है कि मध्य प्रदेश को छोड़कर बाक़ी तीनों राज्य कांग्रेस की झोली में जाते दिख रहे हैं. आउटलुक ने हर प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री पद के दो प्रमुख उम्मीदवारों की तुलना भी की है. इसके अनुसार राजस्थान में विजयाराजे सिंधिया को मिल रहे 32 प्रतिशत समर्थन के मुक़ाबले अशोक गहलोत 43 प्रतिशत के समर्थन के साथ आगे हैं.
मध्य प्रदेश की लड़ाई उमा भारती जीतती दिख रही हैं. उन्हें 38 फ़ीसदी और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को 28 फ़ीसदी लोगों के समर्थन का दावा किया गया है. छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को 31 और दिलीप सिंह जूदेव को 17 प्रतिशत लोगों के समर्थन की बात कही गई है. दिल्ली में शीला दीक्षित ने प्रतिद्वन्द्वी मदन लाल खुराना को कहीं पीछे छोड़ दिया है और 48 फ़ीसदी लोगों का समर्थन हासिल कर लिया है. खुराना को 25 फ़ीसदी लोगों का समर्थन मिलता दिख रहा है. मतदान से कुछ ही दिन पहले आए टाइम्स पोल ने दिल्ली में कांग्रेस को 43 फ़ीसदी और भाजपा को 39 फ़ीसदी लोगों का समर्थन बताते हुए चुनावी जंग रोचक होने की संभावना व्यक्त की है. कितना सही है मायाजाल मगर इन आँकड़ों का मायाजाल कितना सही होता है इस बारे में सेंटर फ़ॉर मीडिया स्टडीज़ के प्रमुख डॉक्टर एन भास्कर राव कहते हैं, "चुनाव संबंधी भविष्यवाणी राजनीतिक दलों के लिए समर्थन का ज़रिया बन गए हैं. सर्वेक्षण कभी भी शत-प्रतिशत सही नहीं हो सकते."
उनका कहना है, "भारत जैसे देश में स्थिति ऐसी है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है." राव का कहना था कि हर रोज़ आने वाले इन सर्वेक्षणों का न तो आधार ही सही होता है और न ही इनमें वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है. वैसे जानकार ये भी मानते हैं कि कई सर्वेक्षणों के पीछे राजनीतिक दलों का पैसा भी लगा होता है. एक अनुमान के अनुसार एक सर्वेक्षण के पीछे लाखों रुपए ख़र्च होते हैं. ग़ौरतलब है कि चुनाव सर्वेक्षण कई बार ग़लत भी हो चुके हैं. फिर वह चाहे तमिलनाडु में जयललिता, बिहार में लालू प्रसाद यादव और पश्चिम बंगाल में माकपा की हार की भविष्यवाणी हो या गुजरात में भाजपा और कांग्रेस के बीच काँटे की टक्कर दिखाने वाले सर्वेक्षण हों. जनता ने ये सभी सर्वेक्षण ग़लत साबित करके दिखा दिए हैं. इसके बावजूद नित नई सर्वेक्षण एजेंसियाँ सामने आ रही हैं और इनमें काम करने के लिए तो किसी डिग्री या डिप्लोमी की भी ज़रूरत नहीं. यानी कुल मिलाकर ये सर्वेक्षण और कुछ करें न करें लोगों के दिमाग़ में एक संदेह तो पैदा कर ही देते हैं. |
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