|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जातिगत समीकरणों के बीच राजनीति
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी दूसरी पारी के लिए वोट माँग रहे हैं. और मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को विश्वास है कि वह पिछली बार की करारी हार का बदला ले सकेगी. राजस्थान में हमेशा की तरह हर विधानसभा क्षेत्र में जातिगत मुद्दे और स्थानीय समस्याएँ हावी हैं. पिछले चुनाव में दो तिहाई बहुमत के बाद सत्ता में आई कांग्रेस ने पाँच सालों में से चार साल में सूखा और अकाल झेला है. और इस बार वह इसी मुद्दे के साथ चुनाव में उतरी है कि सूखा और अकाल से जिस तरह से काग्रेस सरकार ने मुक़ाबला किया है वह अपने आपमें बड़ी उपलब्धि है. कांग्रेस का दावा है कि इसके बावजूद राज्य में विकास के बहुत कार्य हुए हैं. उधर भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि राज्य में पिछले पाँच सालों में विकास का कोई कार्य नहीं हुआ है. भाजपा इस बार फ़सलों की ख़रीदी का मुद्दा भी उठा रही है.
अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ भाजपा ने केंद्रीय मंत्री रही वसुंधरा राजे सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना रखा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि पार्टी के कई नेता नाराज़ दिखाई दे रहे हैं. हालांकि यह देखना होगा कि इसका चुनावों पर कितना असर पड़ेगा. इसके अलावा राज्य में जातियों और आरक्षण का मामला एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. पिछले कुछ समय से राज्य में सवर्ण यानी अगड़ी जाति के लोग आरक्षण की माँग कर रहे हैं. इसके अलावा वहाँ जाट और गूजर मतदाताओं को लुभाना हर चुनाव की तरह राजनीतिक दलों के लिए इस बार भी राजनीतिक चुनौती बनी हुई है.
|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||