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जाट मतदाताओं को रिझाने की कोशिश
राजस्थान में जाट मतदाता सिर्फ़ 12 प्रतिशत ही हैं मगर उनके एकमुश्त वोट डालने की प्रवृत्ति की वजह से सभी पार्टियाँ उन्हें आकर्षित करने की पुरज़ोर कोशिश में लगी हैं. फिर वह चाहे सत्तारूढ़ कांग्रेस हो, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी या भारतीय राष्ट्रीय लोकदल सभी जाट राजनीति पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. राजस्थान में नागौर, सीकर, झुंझनू, भरतपुर और जोधपुर को एक तरह से जाट बेल्ट कहा जाता है. जाटों की संख्या हालाँकि राजपूतों के बराबर है लेकिन उनको अपनी तरफ़ करने के लिए राजनीतिक दल जितना समय लगाते हैं उतना शायद किसी अन्य समुदाय के लिए नहीं. पूर्व केंद्रीय मंत्री नाथूराम मिर्धा पश्चिमी राजस्थान के जाटों के सर्वमान्य नेता थे. वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस उत्तर भारत की सारी सीटें हार गई थीं, तब नाथूराम मिर्धा नागौर की अकेली सीट कांग्रेस के टिकट पर जीते थे. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो वे किसी जाट को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपेंगे मगर वे अपना वायदा पूरा नहीं कर सके और उन्होंने जाटों की नाराज़गी मोल ले ली. वैसे मिर्धा परिवार का प्रतिनिधित्त्व करने वाले सार्वजनिक कार्य मंत्री हरेंद्र मिर्धा हालाँकि इस बात से सहमत नहीं हैं कि जाटों ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है मगर दबी ज़ुबान से जाट मुख्यमंत्री बनाए जाने का वह भी समर्थन करते हैं. जाटों को पिछड़ी जाति के रूप में आरक्षण देने का श्रेय केंद्र सरकार ने लिया था जिसका फ़ायदा उन्हें लोकसभा चुनाव में मिला भी था. इस बीच ओम प्रकाश चौटाला के भारतीय राष्ट्रीय लोकदल ने राजस्थान में 52 लोगों को टिकट देकर जाट वोटों में विभाजन करने का प्रयास किया है. भाजपा ने जाटों की कांग्रेस से नाराज़गी को और ज़्यादा जाट उम्मीदवारों को टिकट देकर हवा देने की कोशिश की है. वहीं भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार वसुंधरा राजे सिंधिया अपने आप को जाट बहू कहकर प्रचारित कर रही हैं. मगर जाट समुदाय ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं और यही कारण है कि हर राजनीतिक दल उन्हें साथ लेने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहा है. |
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