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रविवार, 26 अक्तूबर, 2003 को 16:38 GMT तक के समाचार
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अफ़ग़ानिस्तान में शांति समझौता हुआ
अफ़ग़ान क़बायली लड़ाके
क़रीब एक लाख हथियारबंद लड़ाके सक्रिय हैं

अफ़ग़ानिस्तान में आंतरिक सुरक्षा मंत्री के एक वरिष्ठ सलाहकार ने कहा है कि सरकार ने देश में विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष रोकने के सिलसिले में दो क़बायली सरदारों के साथ समझौता किया है.

इस सलाहकार का कहना है कि देश के उत्तरी भाग में सक्रिय दो सरदारों अब्दुल रशीद दोस्तम और अता मोहम्मद की फ़ौजें आपस में लड़ती रहती थीं, अब ये दोनों सरदार हथियार डालने पर राज़ी हो गए हैं.

काबुल में बीबीसी संवाददाता इयन मैकविलियम का कहना है कि यह सरकार की बड़ी कामयाबी है, ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि सरकार क़बायली सरदारों के हथियार छुड़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का एक कार्यक्रम शुरु करने जा रही है.

अफ़ग़ान अधिकारियों का कहना है कि इस समझौते के तहत दोनों क़बायली सरदार जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम और अता मोहम्मद अपनी फ़ौजें एक साथ मिला लेंगे और वे एक ऐसे कमांडर के नियंत्रण में काम करेंगी जिसकी नियुक्ति सरकार करेगी.

जनरल दोस्तम एक उज़बेक कमांडर हैं और देश के उत्तरी हिस्से में उनका काफ़ी दबदबा है. दोस्तम इस इलाक़े में राष्ट्रपति हामिद करज़ई के विशेष प्रतिनिधि भी हैं.

दूसरी तरफ़ अता मोहम्मद ताजिक क़बीले से हैं और वे रक्षामंत्री के नज़दीकी माने जाते हैं.

सत्ता समीकरण

जनरल दोस्तम को उत्तरी हिस्से में निर्विवाद रूप से सबसे ज़्यादा ताक़तवर माने जाते रहें हैं लेकिन तालेबान के बाद नई सरकार बनने पर इस इलाक़े में अता मोहम्मद का असर बहुत बढ़ा है.

मौजूदा सरकार में उत्तरी गठबंधन का दबदबा है और उसमें ताजिक क़बीले के काफ़ी लोग हैं.

सत्ता के इस नए समीकरण का नतीजा यह हुआ है कि जनरल दोस्तम और अता मोहम्मद की फौजों के बीच अक्सर संघर्ष होता रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिक
विदेशी सैनिक सरकार की मदद कर रहे हैं

सरकार ने इस संघर्ष को रोकने और सरदारों के हथियार छुड़वाने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम शुरु किया है जिसे संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन हासिल है.

पिछले सप्ताह शुरु किए गए इस कार्यक्रम के तहत देश भर के क़रीब एक लाख लड़ाकों के हथियार छुड़वाने का लक्ष्य रखा गया है.

इन लोगों को या तो साफ़ सुथरा नागरिक जीवन जीने में मदद की जाएगी या फिर इन्हें राष्ट्रीय सेना में शामिल किया जाएगा.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इस समय तो विदेशी सेनाएं सरकार को सहयोग दे रही हैं लेकिन अगर इस कार्यक्रम को सफल बनाना है तो इन दोनों क़बायली सरदारों की ही तरह बाक़ी को भी यह समझना होगा कि दोस्ताना माहौल बनाने के लिए किए गए समझौते पर संजीदगी से अमल करें.

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