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हमले के आत्मघाती होने के संकेत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन और ग्लासगो की घटनाओं को जोड़कर पुलिस इसलिए देख रही है क्योंकि ग्लासगो हवाई अड्डे के भीतर तक जो कार घुसाने की कोशिश की जा रही थी उसमें सिर्फ़ ईंधन ही नहीं रखा था बल्कि उसमें प्रोपेन गैस के चार से पाँच सिलिंडर भी रखे थे. उसमें विस्फोट की काफ़ी संभावना थी बल्कि हल्का सा विस्फोट हुआ भी. अगर वे लोग विस्फोट करने में क़ामयाब हो जाते तो कम से कम 100 या कहें कि सैकड़ों लोग तक मारे जा सकते थे. लोग बस बाल-बाल बच गए. लंदन और ग्लासगो के हमले करने के तरीक़ों में भी संबंध है. भले ही दोनों जगहों के हमलावर एक दूसरे को नहीं जानते हों मगर इसे सिर्फ़ संयोग ही नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये कुछ ज़्यादा ही संयोग की बात हो जाएगी कि दोनों ही हमलों की कोशिश लगभग एक जैसी थी. लंदन और ग्लासगो के हमलों में अंतर सिर्फ़ इतना था कि ग्लासगो के हमले में कीलें नहीं रखी गईं थीं. मगर बाक़ी सब तो एक ही जैसा था.
ये गैस और पेट्रोल को मिलाकर विस्फोटक बनाने की कोशिश थी, जिससे ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान होता. अल-क़ायदा से संबंध वैसे हमलों का समय भी महत्त्व रखता है. कुछ ही दिनों के भीतर एक जैसे हमलों की कोशिश और ये लगता है कि समन्वय बैठाकर हमला करने की कोशिश हुई है. ये अल-क़ायदा का एक विशेष तरीक़ा है और इससे लोगों में इस बात का शक़ बढ़ेगा कि इन लोगों का पाकिस्तान में बैठे अल-क़ायदा के मुख्य नेतृत्त्व के साथ समन्वय था. ब्रिटेन के ख़ुफ़िया विभाग के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि हर जगह नज़र रखी जा सके क्योंकि किसी पर नज़र रखने के लिए काफ़ी लोगों की ज़रूरत होती है. अब ये स्पष्ट है कि ये ब्रिटेन को लगातार निशाना बनाने की रणनीति का हिस्सा है मगर ये कहना मुश्किल है कि ये कब तक चलेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें ब्रिटेन में चरमपंथी हमले के ख़तरे का स्तर 'गंभीर'30 जून, 2007 | पहला पन्ना बहुत बड़ा ख़तरा टलाः लंदन पुलिस29 जून, 2007 | पहला पन्ना लंदन में एक और बम बरामद29 जून, 2007 | पहला पन्ना लंदन में बम धमाकों के एक साल बाद06 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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