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शनिवार, 30 दिसंबर, 2006 को 23:36 GMT तक के समाचार
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'मैंने इराक़ के दुश्मनों को ख़त्म किया'
सद्दाम
सद्दाम हुसैन ने फाँसी से पहले कोई विरोध नहीं किया
दुजैल नरसंहार मामले में इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को शनिवार सुबह होते ही फाँसी दे दी गई.

जब पूर्व इराक़ी नेता को फाँसी दी गई तब वहाँ मौजूद थे इराक़ी जज मुनीर हद्दाद. बीबीसी संवाददाता जॉन सिंपसन ने हद्दाद से बातचीत की और फाँसी से पहले सद्दाम हुसैन की गतिविधियों के बारे में पूछा. पेश हैं, इस बातचीत के अहम अंश.

आपने वहाँ क्या देखा?

वहाँ मौजूद गार्डों में से एक ने सद्दाम हुसैन से पूछा कि क्या उन्हें मरने से डर लग रहा है. सद्दाम का जवाब था, "मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी काफ़िरों और घुसपैठियों से लड़ने में लगा दी." इसके बाद एक अन्य गार्ड ने पूछा, "तुमने इराक़ को और हमें नष्ट क्यों कर दिया? तुमने हमें भूखों मारा और ये मौक़ा दिया कि अमरीकी यहाँ क़ब्ज़ा कर सकें."

इस पर सद्दाम का जवाब था, "मैंने हमलावरों और ईरानियों को नष्ट किया, मैंने इराक़ के दुश्मनों को ख़त्म किया और इराक़ को ग़रीबी से अमीरी का रास्ता दिखाया."

क्या सद्दाम हुसैन को किसी तरह की कोई दवा दी गई थी?

नहीं, बिल्कुल नहीं. सद्दाम पूरी तरह सामान्य थे और पूरी तरह नियंत्रण में थे. उन्हें अपना भाग्य पता था और वो जानते थे कि उन्हें अब मौत का सामना करना है. उन्होंने कहा, "ये मेरा अंत है... ये मेरे जीवन का अंत है. मगर मैंने अपना जीवन एक लड़ाकू और एक राजनीतिक आतंकवादी की तरह शुरू किया था- इसलिए अब मौत मुझे डराती नहीं है."

इसके बाद क्या हुआ?

गार्डों ने सद्दाम हुसैन के हाथ खोले और हाथ पीछे करके बाँध दिए. इसके बाद उनके पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गईं और फिर उन्हें फाँसी के तख़्ते पर ले गए. वो हमेशा की तरह, "अल्लाहो अक़बर" और कुछ राजनीतिक नारे भी लगा रहे थे, जैसे- "अमरीका मुर्दाबाद और हमलावर मुर्दाबाद."

फिर सद्दाम ने कहा, "हम तो जन्नत में जा रहे हैं जबकि हमारे दुश्मन नर्क में सड़ेंगे." उन्होंने इराक़ियों से प्यार मोहब्बत से रहने को कहा मगर साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इराक़ियों को अमरीकियों और ईरानियों से लड़ना चाहिए.

इसके बाद?

इसके बाद जब गार्ड उन्हें फाँसी के तख़्ते पर ले गए तो उन्होंने वहाँ सद्दाम हुसैन के सिर पर काला नक़ाब पहनाने की कोशिश की मगर सद्दाम ने मना कर दिया. इसके बाद उन्होंने क़ुरान की आयतें पढ़ीं. फिर कुछ गार्डों ने अरबी भाषा में उन पर ताने मारे. वहाँ मौजूद एक मौलवी ने सद्दाम से कुछ धार्मिक शब्द बोलने को कहा. सद्दाम ने बोला तो मगर उनकी आवाज़ में बहुत ही कटाक्ष था.

वो ही उनके अंतिम शब्द थे. इसके बाद उनके गले के इर्द-गिर्द रस्सी डाल दी गई, उसे कसा गया और उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया.

इसके अलावा भी उन्होंने कुछ कहा था क्या?

उन्होंने कहा, "अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा नहीं है और मोहम्मद ख़ुदा के संदेशवाहक थे."

इसके बाद क्या उनकी जान तुरंत चली गई?

हाँ उनकी मौत तुरंत हो गई और उस रस्सी का असर भी मैंने देखा. बहुत ही भयंकर मंज़र था वो.

क्या आप ख़ुश हैं कि सद्दाम की अब मौत हो चुकी है?

क्या मैं आपको ख़ुश दिख रहा हूँ? मैं एक जज हूँ और मैंने सिर्फ़ अपना काम पूरा किया है. मुझ पर ये ज़िम्मेदारी दी गई ती कि मैं सद्दाम हुसैन की फाँसी पर नज़र रखूँ और मैंने वही किया. मैं न तो ख़ुश हूँ और न ही दुःखी.

बतौर एक इराक़ी नागरिक, मेरी भावनाएँ तो हैं मगर मैं जितनी अच्छी तरह से अपना काम कर सकता था मैंने किया. सद्दाम हुसैन को उसके अधिकार भी दिए. मैं वहाँ कोई बदला लेने नहीं गया था.

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