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शुक्रवार, 13 अक्तूबर, 2006 को 19:32 GMT तक के समाचार
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बान की-मून संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव
बान की-मून
बान की-मून संयुक्त राष्ट्र महासचिव बनने वाले दूसरे एशियाई हैं
जैसा कि तय था दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री बान की-मून को शुक्रवार को औपचारिक रुप से संयुक्त राष्ट्र का नया महासचिव चुन लिया गया है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को 62 वर्षीय बान की-मून को सर्वसम्मति से इस पद के लिए चुन लिया.

वे संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान महासचिव कोफ़ी अन्नान की जगह संभालेंगे जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर को समाप्त हो रहा है. कोफ़ी अन्नान पाँच-पाँच बरसों के दो कार्यकाल तक इस पद पर रहे.

सोमवार को सुरक्षा परिषद की एक बैठक में सदस्य देशों ने बान की-मून के नाम पर अपनी सहमति दे दी थी. इसके बाद से ही उनका महासचिव चुना जाना तय हो गया था.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की होड़ में भारत के शशि थरूर सहित छह अन्य उम्मीदवार भी थे लेकिन उन्होंने एक-एक करके अपना नाम वापस ले लिया था.

बर्मा के यू थांट के बाद महासचिव बनने वाले वे दूसरे एशियाई हैं. बर्मा के यू थांट 1961 से 1971 तक संयुक्त राष्ट्र महासचिव रहे थे.

राजनयिक के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले बान की-मून इस समय दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री हैं.

सर्वसम्मति

संयुक्त राष्ट्र में इस बात को लेकर सहमति बहुत पहले बन गई थी कि महासचिव के पद पर इस बार किसी एशियाई को चुना जाए.

शुक्रवार को सभी 192 सदस्यों ने बिना मतदान बान की-मून को सर्वसम्मति से चुन भी लिया.

बाद में बान की-मून ने कहा कि वे ‘अतिसम्मानित’ महसूस कर रहे हैं और वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके कार्यकाल में संस्था और उन्नति करे.

उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र की सफलता इस बात में नहीं है कि वह क्या आश्लासन देता है बल्कि इसमें है कि वह उन लोगों के लिए क्या करता है जिनको इसकी ज़रुरत है.”

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की इस समय सबसे ज़्यादा ज़रुरत है.

बान की-मून की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब संयुक्त राष्ट्र उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के मसले को सुलझाने का प्रयास कर रहा है.

कोफ़ी अन्नान ने अपने उत्तराधिकारी को बधाई देते हुए कहा है कि वह सही मायनों में वैश्विक समझ वाले व्यक्ति हैं.

कुछ विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि संयुक्त राष्ट्र इस समय कड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है और बान की-मून इतने सशक्त नहीं हैं कि संगठन की अगुवाई कर सकें.

लेकिन बान की-मून का कहना है कि उनके भीतर इतनी शक्ति है कि वे जनहित को ध्यान में रखते हुए संगठन को नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं.

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