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जीत की ललक में जान देते पर्वतारोही | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने 53 वर्ष पहले पहली बार एवरेस्ट की सफल चढ़ाई की थी. तब से अब तक सैकड़ों लोग संसार की इस सबसे ऊँची चोटी पर चढ़ने का सफल-असफल प्रयास करते रहे हैं. हर साल जहाँ कई लोग इस चोटी पर अपनी सफलता का झंडा गाड़ पाते हैं वहीं कई दूसरे लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. चढ़ाई के बेहतर उपकरण और स्थायी रास्ते खोज लिए जाने के बाद चढ़ाई के दौरान होने वाली मौतों में कमी आने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब भी प्रत्येक दस सफल चढ़ाई पर एक मौत की दर पिछले कई वर्षों से कायम है. केवल 2006 में अब तक पंद्रह लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. यूँ तो ज्यादातर मौतें चोट खाने और थकान की वजह से होती हैं लेकिन उँचाई से संबंधित बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या भी बहुत ज्यादा है. मरने वालों में ज्यादातर तादाद उन अनुभवहीन लोगों की होती है जो भारी रकम खर्च करके एवरेस्ट को जीतने का प्रयास करते हैं. वहाँ के कठोर वातावरण से निपटने की पूरी तैयारी के बावजूद ऊंचाई पर होने वाली समस्याओं के बारे पूरी जानकारी नहीं होती. समस्या यह है कि 8,300 मीटर की उँचाई पर स्थित कैंप 3 के ऊपर चढ़ने का अनुभव आप एवरेस्ट पर चढ़े बिना हासिल भी नहीं कर सकते. चढ़ने वालों को प्रायः यह पता नहीं होता कि 8,300 मीटर की चढ़ाई के बाद उनकी हालत क्या होगी. अधिक ऊँचाई पर होने वाली दो प्रमुख बीमारियाँ हैं- हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल ओइंडेमा और हाई एल्टीट्यूड पुल्मोनरी ओइंडेमा. अब पर्वतारोही इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि किस तरह एवरेस्ट तक पहुँचने की कोशिश करने वालों को दुनिया से विदा होने से रोका जाए. | इससे जुड़ी ख़बरें एवरेस्ट पर चढ़ने को तैयार किशोर14 मार्च, 2006 | खेल कृत्रिम पैरों के सहारे एवरेस्ट विजय16 मई, 2006 | खेल एवरेस्ट पर चढ़ने का विश्व रिकार्ड19 मई, 2006 | भारत और पड़ोस संगीत ने छुई नई ऊँचाइयाँ03 नवंबर, 2005 | मनोरंजन एवरेस्ट की ऊँचाई पर शादी रचाई03 जून, 2005 | भारत और पड़ोस एवरेस्ट के पर्यावरण संतुलन को ख़तरा01 जून, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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