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बुधवार, 08 फ़रवरी, 2006 को 13:41 GMT तक के समाचार
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...आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?

मंदिर में लंगर खाने आते हैं हर रोज़ अनेक भारतीय डॉक्टर
पूर्वी लंदन के इलाक़े ईस्टहैम की सड़कों पर निकलें तो ऐसा लगता है मानो हर दूसरा व्यक्ति भारत से आया डॉक्टर है.

नज़रें घुमाएँ तो कई जगह प्लैब के कोचिंग सेंटर के बोर्ड दिखाई देते हैं, प्लैब यानी प्रोफ़ेशनल एंड लिंग्विस्टिक एसेसमेंट बोर्ड. इस परीक्षा का पहला स्तर पास करने के बाद ही विदेशी डॉक्टरों को ब्रिटेन में प्रवेश दिया जाता है.

ब्रिटेन में नौकरी पाने या प्रैक्टिस करने के लिए विदेशी डॉक्टरों को प्लैब2 यानी दूसरे चरण की परीक्षा पास करनी होती है.

अच्छी ज़िंदगी का सपना और भविष्य में आगे बढ़ने का इरादा लेकर आए भारतीय डॉक्टरों का लंदन में दम घुटने लगा है, बेरोज़गारी और मुफ़लिसी से जूझने के बाद अब ये अपने देश लौटने न लौटने की कश्मकश से गुज़र रहे हैं.

 माँ बाप के लिए ये सोच पाना बहुत मुश्किल है कि उनके होनहार बेटे ब्रिटेन में लंगर खाने को मजबूर हैं
डॉक्टर निहारेंदु

कई महीनों तक संघर्ष करने वाले डॉक्टर निहारेंदु बताते हैं कि डॉक्टर बहुत बुरी हालत में रहते हैं, ईस्टहैम के महालक्ष्मी मंदिर का सहारा न हो तो इन डॉक्टरों का जीना मुश्किल हो जाता.

वे कहते हैं, "भारतीय डॉक्टर पिछले बीस सालों से महालक्ष्मी मंदिर में खाने आते हैं, उनके माँ बाप के लिए ये सोच पाना बहुत मुश्किल है कि उनके होनहार बेटे ब्रिटेन में लंगर खाने को मजबूर हैं."

ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ़ फिज़िशियंस ऑफ़ इंडियन ऑरिजिन के डॉक्टर रमेश मेहता का कहना है कि ब्रिटेन में भारत से आए लगभग सात हज़ार डॉक्टर बेरोज़गार हैं.

संघर्ष

औसतन तीस से चालीस के वर्ष की उम्र के इन डॉक्टरों में से तो कई ऐसे हैं जो भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों में कई वर्ष काम करने के बाद बेहतर अवसर की तलाश में ब्रिटेन आ गए हैं और अब फ़ाके करने को मजबूर हैं.

प्लैब2 के लिए डॉक्टरों को कड़ी मेहनत करनी होती है

एक-एक कमरे में कई डॉक्टर रहते हैं, उन कमरों की हालत मुंबई की चालों से कहीं बेहतर नहीं है, आठ-दस लोगों के लिए अगर एक गुसलख़ाना हो तो आप समझ सकते हैं कि क्या स्थिति होगी.

ऐसी कठिन परिस्थितियों में रहकर प्लैब2 पास करने के बाद शुरू होता है नौकरी का इंतज़ार, ज़्यादातर डॉक्टरों का कहना है कि वे सैकड़ों अर्ज़ियाँ भेज चुके हैं लेकिन बुलावा तक नहीं आता.

दिल्ली से आए डॉक्टर राकेश की तरह कई लोग हैं जो ये मानते हैं कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है.

वजह

दरअसल, ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) में दक्षिण एशिया से आए डॉक्टरों की संख्या लगभग एक तिहाई है. पिछले चालीस वर्षों से भारतीय डॉक्टर परंपरागत तौर पर ब्रिटेन आते रहे हैं और नौकरियाँ पाते रहे हैं.

 हम जब भारत में थे तब अगर कोई हमसे कहता कि हालत बहुत ख़राब है, वहाँ मत जाइए तो हम उस पर विश्वास नहीं करते, अब भी लोग नहीं मानेंगे उनका आना जारी रहेगा
डॉक्टर निपाम डेका

लेकिन पिछले पाँच वर्षों में यहाँ आने वाले डॉक्टरों की संख्या चार गुना से अधिक बढ़ गई है लेकिन एनएचएस की नौकरियों की संख्या इस अनुपात में नहीं बढ़ीं, जिसका नतीजा है--बेरोज़गारी.

डॉक्टर अपनी इस हालत के लिए जनरल मेडिकल काउंसिल (जीएमसी) को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, उनका कहना है कि अगर नौकरियाँ ही नहीं हैं तो प्लैब का परीक्षा आयोजित करने की क्या ज़रूरत है.

डॉक्टर निहारेंदु बताते हैं कि "प्लैब की परीक्षा के लिए मोटी फ़ीस वसूली जाती है, हमें तो यह भी लगता है कि कहीं यह लोगों को झाँसा देकर पैसा कमाने का तरीक़ा तो नहीं है?"

मगर जीएमसी के अध्यक्ष ग्राहम केटो कहते हैं, "यह परीक्षा लाभ कमाने का बहाना क़तई नहीं है, हर डॉक्टर को प्लैब की परीक्षा देने का अधिकार है, अगर हम इस पर पाबंदी लगा दें तो ख़तरा है कि हम भारत से कुछ बेहतरीन डॉक्टरों को यहाँ आने से रोक रहे हों."

पूर्वोत्तर भारत से ईस्टहैम पहुँचे डॉक्टर निपाम डेका का कहना है कि "हम जब भारत में थे तब अगर कोई हमसे कहता कि हालत बहुत ख़राब है, वहाँ मत जाइए तो हम उस पर विश्वास नहीं करते, अब भी लोग नहीं मानेंगे उनका आना जारी रहेगा."

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