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कार्टून विवाद पर जुमे के दिन प्रदर्शन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पैग़ंबर मोहम्मद साहब के कार्टून छापने से नाराज़ मुसलमानों ने जुमे के रोज़ कई स्थानों पर प्रदर्शन किए हैं. इराक़, मिस्र, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फ़लस्तीनी इलाक़ों में मुस्लिम समूहों प्रदर्शन किए हैं. इंडोनेशिया में प्रदर्शनकारी डेनमार्क के दूतावास के परिसर में घुस गए और उन्होंने वहाँ दूतावास की निशानी वाले बोर्ड पर अंडे फेंके. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने कड़े शब्दों में कार्टूनों के छापे जाने की भर्त्सना की है. पाकिस्तानी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में एक प्रस्ताव पारित कर हज़रत मोहम्मद के कार्टून छापे जाने की घटना की निंदा की है. प्रस्ताव में कहा गया,"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस दुष्ट, घृणित और भड़काऊ कृत्य को कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता". बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी बैतुल मुकर्रम मस्जिद के बाहर नमाज़ के बाद कार्टूनों के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं. उल्लेखनीय है कि ये विवादित कार्टून पहली बार पिछले वर्ष सितंबर में डेनमार्क के ही एक अख़बार में छपे थे. इसके बाद यूरोप के कई और पत्र-पत्रिकाओं में ये कार्टून प्रकाशित हुए. राजदूतों के साथ बैठक
इस बीच डेनमार्क के प्रधानमंत्री एनर्स फ़ो रासमुसेन ने राजधानी कोपेनहेगन में विभिन्न राष्ट्रों के राजदूतों को बातचीत के लिए बुलाया है. सीरिया और सऊदी अरब ने पहले ही डेनमार्क से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया है. तीन महीने पहले डेनमार्क में 11 मुसलमान राजदूतों ने डेनिश प्रधानमंत्री से मिलने की इच्छा जताई थी लेकिन उन्होंने ये आग्रह ठुकरा दिया था. वैसे डेनिश प्रधानमंत्री ने कार्टूनों से हुए नुक़सान के लिए एक अरबी टीवी पर माफ़ी माँगी है लेकिन साथ ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का भी बचाव किया है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि समाचारपत्रों में किसी प्रकाशन के लिए सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. विवाद दरअसल, सारा विवाद तीन महीने पहले शुरू हुआ जब डेनमार्क के एक अख़बार युलाँस पोस्तेन ने मोहम्मद साहब के कार्टून छापे. पैगंबर मोहम्मद के जो कार्टून छपे हैं उनमें से एक में उन्हें पगड़ी पहले दिखाया है जिसमें एक टाइम बम लगा है. इस तरह के चित्रों को इस्लामी संगठन पैगंबर मोहम्मद का अपमान बता रहे हैं. उसके बाद नॉर्वे की एक पत्रिका ने भी ये कार्टून छापे.
नतीजा था कई इस्लामी संगठनों का विरोध प्रदर्शन. बात इतनी बढ़ी कि डेनमार्क और नॉर्वे के लोगों के ख़िलाफ़ हमलों की धमकियाँ मिलने लगीं और इन देशों के सामान का कुछ मुसलिम राष्ट्रों में विरोध होने लगा. डेनमार्क के अख़बार यूलाँस पोस्तेन के एक संपादक ने मुसलमानों से ये कहकर माफ़ी भी माँगी कि अगर पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों से उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं तो वो इसके लिए माफ़ी माँगते हैं, लेकिन इससे भी बात बनी नहीं. इसके बाद आग में घी का काम किया यूरोप के कुछ अख़बारों के कार्टून छापने के काम ने. इस बुधवार को ये कार्टून छापने के बाद इन अख़बारों का कहना था कि वो प्रेस का आज़ादी को महत्वपूर्ण मानते हैं इसीलिए उन्होंने ये कार्टून फिर छापे. लेकिन सऊदी अरब और फ़लस्तीनी इलाक़ों सहित कई इस्लामी देशों में इसका जमकर विरोध अब भी जारी है. हाल ही में डेनमार्क की कंपनी ने बताया कि उसके दूध उत्पाद मध्यपूर्व एशिया में बिकने बंद हो गए हैं. मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने कहा है कि प्रेस की आज़ादी के नाम पर किसी धर्म की तौहीन नहीं की जानी चाहिए और इससे चरमपंथी ताकतें ही मज़बूत होंगी. इंडोनेशिया ने भी इसी तरह का बयान जारी किया है. इस विवाद से यूरोप में एक नई बहस शुरू हो गई है कि जब कई फ़िल्मों, टीवी कार्यक्रमों और प्रेस में ईसा मसीह का मज़ाक उड़ाया जा चुका है तो यहाँ के उदारवादी समाज में सिर्फ़ मुसलमानों के लिए अलग पैमाना क्यों बनाया जाए और क्या ये सही होगा. |
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