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कोर्ट ने सजा-ए-मौत का फ़ैसला पलटा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लीबिया में सुप्रीम कोर्ट ने छह विदेशी स्वास्थ्यकर्मियों को सुनाई गई मौत की सजा को ख़ारिज़ करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया है. इनमें से एक फ़लस्तीनी डॉक्टर है जबकि पाँच बुल्गारियाई नर्स हैं. बेंग़ाज़ी शहर में 426 बच्चों को एचआईवी वायरस से संक्रमित करने के आरोप में मई 2004 में इन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. संक्रमित बच्चों में से 50 की मौत हो चुकी है. हालाँकि छहों अभियुक्तों ने हमेशा ही ख़ुद को निर्दोष बताया है. सात साल से जेल में बंद इन लोगों का कहना है कि अस्पताल के ख़राब रखरखाव के कारण संक्रमण हुआ होगा. अमरीका, यूरोपीय संघ और बुल्गारिया इनकी रिहाई की अपील कर चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है इस मामले की निचली अदालत में नए सिरे से सुनवाई का भी आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश कुछ स्वास्थ्यकर्मियों के यह कहने पर दिया है कि उनसे ज़बरदस्ती बयान लिए गए थे. बुल्गारिया ने लीबियाई सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है. बीबीसी के एक संवाददाता के अनुसार ऐसा लगता है कि लीबिया ने इस मामले पर पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण रिश्ते को सामान्य बनाने के उद्देश्य से यह क़दम उठाया है. | इससे जुड़ी ख़बरें भीख मांगना बंद करें: गद्दाफ़ी04 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना बुल्गारिया के स्वास्थ्यकर्मियों को मृत्युदंड06 मई, 2004 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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