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तेल की बढ़ती क़ीमत का ख़ौफ़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इन दिनों तेल के दाम आसमान छू रहे हैं और इतने ऊपर चल रहे हैं जितने कि इतिहास में कभी नहीं रहे. हाल ही में जाने-माने निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत आने वाले समय में 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती है. ये अनुमानित क़ीमत कितनी ज़्यादा है इसका अंदाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से वर्ष 2004 तक औसतन तेल की क़ीमत 21 से 23 डॉलर प्रति बैरल रही है. लंदन स्थित शेख यमानी इंस्टिट्यूट ऑफ़ ग्लोबल एनर्जी रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री डॉक्टर लियो ड्रॉलस कहते हैं कि इसकी चिंता कई अर्थशास्त्रियों को है. उन्होंने कहा, “ ये आशंका है कि कुछ स्थितियाँ बनीं तो तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकती है – इसका ये मतलब ये नहीं लगाना चाहिए कि ऐसा होगा ही, लेकिन इसी आशंका से सब डरे हुए हैं. आम तौर पर ये मानकर चलिए कि जब तेल की क़ीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में लगभग आधे फ़ीसदी की गिरावट आती है. इसीलिए कोशिशें जारी हैं कि तेल की क़ीमतें उस भयानक स्तर तक न पहुँच जाएँ.” अगर तेल की क़ीमतें इतनी ऊपर गईं तो भारत में पेट्रोल की क़ीमतें कितनी बढ़ सकती हैं? जानी मानी पेट्रोलियम पत्रिका अपस्ट्रीम के भारत संवाददाता नरेंद्र तनेजा इस बारे में कहती हैं, “एक मोटे अनुमान के तौर पर आप ये मानकर चलिए कि जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब भी क़ीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो भारत में पेट्रोल 5 से 7 रुपए प्रति लीटर बढ़ता है.” तनेजा कहते हैं, “अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें 100 डॉलर तक पहुँचीं तो भारत सरकार पहली कोशिश करेगी कि सारा बोझ आम जनता तक न पहुँचे. तेल की कंपनियों को कुछ नुक़सान उठाने को कहा जा सकता है. लेकिन भारतीय तेल कंपनियों की हालत भी नाज़ुक है. इतना बोझ बढ़ने पर ये भारतीय तेल कंपनियाँ बीमार कंपियों की श्रेणी में जा सकती हैं जिससे गंभीर संकट पैदा हो जाएगा. ऐसी स्थिति में ये कहा जा सकता है कि अगर तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल पहुँची तो भारत में पेट्रोल की क़ीमत पैंसठ रुपए प्रति लीटर तक पहुँच सकती है.” इराक़ और ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं तेल की क़ीमतें कम करने के लिए. नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “ अमरीका इराक़ में इसीलिए नहीं गया था कि वहाँ तानाशाही है या फिर क्योंकि सद्दाम वहाँ के अत्याचारी शासक थे. इराक़ का मध्य पूर्व की तेल नीति में वो स्थान है जो वहाँ की तेल संस्कृति निर्धारित करता है. अमरीका की सोच ये थी कि वहाँ तेज़ी से तेल निकालकर वो विश्व बाज़ार में तेल की क़ीमत को 15 डॉलर प्रति बैरल तक ले आएगा, लेकिन हुआ है उसका ठीक उलट. इराक़ में ख़राब सुरक्षा के कारण वहाँ से तेल निकाला नहीं जा रहा है.” शेख यमानी इंस्टिट्यूट ऑफ़ ग्लोबल एनर्जी रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री डॉक्टर लियो ड्रॉलस भी इस विचार से सहमत हैं. उन्होंने कहा, “1991 में कुवैत के हमले से पहले इराक़ में 35 लाख बैरल तेल प्रतिदिन निकाला जा रहा था और अब बमुश्किल 20 लाख बैरल प्रतिदिन निकाल पा रहा है.” नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि ईरान के मामले में भी संभलकर चलने की ज़रूरत है. वह कहते हैं, “ ज़्यादातर तेल विशेषज्ञ कहते हैं, यहाँ तक कि अमरीकी कंपनियाँ भी मानती हैं कि अगर ईरान पर हमला कर दिया जाता है तो तेल की क़ीमतें 100 तो छोड़िये 130-140 डॉलर प्रति बैरल न पहुँच जाएँ.” तेल विशेषज्ञ डॉक्टर लियो ड्रॉलस कहते हैं कि तेल की क़ीमतें बढ़ने का कारण ये भी है कि वर्ष 2003 से 2004 तक तेल की माँग तीन देशों में बढ़ी है और वो हैं अमरीका, भारत और चीन. उन्होंने कहा, “पहले पैदा हुए तेल संकटों के मुकाबले इस बार का संकट अलग है. अमरीका में तेल की माँग दो फ़ीसदी बढ़ी है, भारत में लगभग छह फ़ीसदी लेकिन सबसे ज़्यादा माँग बढ़ी है चीन में– 15 फ़ीसदी!” विशेषज्ञ कहते हैं कि मंत्रालयों के झगड़े, तालमेल की कमी और दूरगामी नीति न होने के कारण भारत तेल की राजनीति में मार खाता है जिसके गंभीर परिणाम वो आज भुगत रहा है. |
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