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शुक्रवार, 05 अगस्त, 2005 को 15:20 GMT तक के समाचार
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कितना सही था बम गिराने का फ़ैसला

हैरी एस ट्रूमैन
ट्रूमैन के अनुसार अमरीकी सैनिकों की जान बचाने के लिए उन्हें कठोर फ़ैसला करना पड़ा
हिरोशिमा के विनाश की 60वीं बरसी पर कुछ नए सवाल उठाए जा रहें हैं.

एक सवाल तो ये कि क्या परमाणु बम का इस्तेमाल ज़रुरी था.

और दूसरा सवाल ये कि क्या परमाणु हमले की वजह से ही जापान ने आत्मसमर्पण किया.

इतिहासकार शायद इन प्रश्नों के उत्तरों पर कभी सहमत नहीं होंगे और ना ही उन सैनिकों के बच्चे भी जिनके पिता को अगर जापान पर चढ़ाई के लिए भेज दिया जाता तो आज वो जिंदा नहीं होते.

ऐसे लोग एहसानमंद होगें कि परमाणु बमों का इस्तेमाल हुआ.

बम गिराने के समय अमरीका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन और बम गिराने के कुछ महीने पहले तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल ने परमाणु बमों की सराहना की थी.

लेकिन अभी तक इस बात पर मतभेद हैं कि ऐसा निर्णय क्यों लिया गया था.

मतभेद

 रुढ़िवादी विचारधारा यह है कि ट्रूमैन के पास जापान पर चढ़ाई से बचने का यही एक उपाय था, और लगातार हवाई हमलों से जापान को आत्मसमर्पण नहीं करवाया जा सकता था क्योंकि जापान की सेना आख़िर तक लड़ने के लिए तैयार थी

रुढ़िवादी विचारधारा यह है कि ट्रूमैन के पास जापान पर चढ़ाई से बचने का यही एक उपाय था, और लगातार हवाई हमलों से जापान को आत्मसमर्पण नहीं करवाया जा सकता था क्योंकि जापान की सेना आख़िर तक लड़ने के लिए तैयार थी.

ट्रूमैन के दिमाग़ में अमरीका को होने वाले भारी नुक्सान की भी चिंता थी.

ट्रूमैन की जीवनी लिखने वाले डेविड मैकक्लाग का कहना है कि जापान पर चढ़ाई की योजना वास्तविक थी.

ट्रूमैन ने इससे पहले सेनाध्यक्ष को जापान पर अंतिम आक्रमण के लिये 10 लाख सैनिकों को तैनात करने के लिए कहा था. जबकि जापान के पास उस समय 25 लाख सैनिकों की फ़ौज थी.

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जापान को समर्पण के लिये मजबूर करने के पर्याप्त प्रयास किए गए थे?

जापान का समर्पण

 मिथक कि केवल परमाणु बम से ही युद्ध का अंत हो सकता है ट्रूमैन के अंत:करण और सामूहिक अमरीकी मनोभावना को शांत करने के लिए ही गढ़ा गया था
प्रोफ़ेसर सुयोशी हासेगावा

हाल ही में छपी एक नई किताब "रेसिंग द एनिमी" में यह आरोप लगाया गया है कि स्तालिन और ट्रूमैन दोनों ने ही जापान के समर्पण के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया.

किताब के लेखक कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर और शीतयुद्ध अध्ययन केंद्र के निदेशक सुयोशी हासेगावा का कहना है कि हिरोशिमा पर परमाणु हमले के बाद सोवियत सेना का युद्ध में कूद पड़ना ऐसी घटना थी जिसनें जापान को चिंता में डाल दिया था और जिसकी वजह से उसने आत्मसमर्पण कर दिया.

वे आगे लिखते हैं कि ट्रूमैन ने बिना शर्त समर्पण की मांग में बदलाव से इंकार कर दिया था क्योंकि वो पर्ल हार्बर पर हमले का बदला लेना चाहते थे.

हासेगावा का मानना है कि इस तरह से अवसर बर्बाद कर दिए गए. यह मिथक कि केवल परमाणु बम से ही युद्ध का अंत हो सकता है ट्रूमैन के अंत:करण और सामूहिक अमरीकी मनोभावना को शांत करने के लिए ही गढ़ा गया था.

 इस बात पर विश्वास कर लेना कोरी कल्पना ही है न कि इतिहास, कि परमाणु बम के गिराए जाने से पहले ही युद्ध का अंत होने ही वाला था
रिचर्ड बी फ्रैंक, अमरीकी इतिहासकार

लेकिन अमरीकी इतिहासकार रिचर्ड बी फ्रैंक ने 1999 में अपनी किताब "डाउनफॉल" में लिखा है,"इस बात पर विश्वास कर लेना कोरी कल्पना ही है न कि इतिहास, कि परमाणु बम के गिराए जाने से पहले ही युद्ध का अंत होने ही वाला था".

उन्होंने जापान के विदेश मंत्री शिगेनोरी टोगो की रुस से बातचीत शुरु करने के प्रयासों की समीक्षा की है. उनका मानना है कि यह प्रयास इतने अनिश्चित और कमज़ोर थे कि रुस में जापान के राजदूत नाओताके सातो ने उन्हें ठुकरा दिया था.

सातो ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को कई तार भेजे जिनमें जापानी प्रस्ताव के ठोस न होने की बात कही गई थी. अमरीका को भी टोगो और सातो के बीच हुए संवादों को पढ़ कर उनके पुख़्ता न होने के बारे में पता चल गया था.

रूस की भूमिका

हासेगावा का यह तर्क कि जापान के समर्पण के लिये परमाणु बम से अधिक रुस ज़िम्मेवार था रुढ़िवादियों के गले नहीं उतरता है.

ऐसा इसलिये कि यह सही है कि परमाणु बम अनामी जैसे मंत्रियों और उनके सहयोगियों पर दबाव नहीं डाल सके थे लेकिन इन बमों का यह प्रभाव अवश्य पड़ा कि जापान के सम्राट हीरोहीतो को बीच में दख़ल देना पड़ा.

उन्होनें इन बमों का उल्लेख सदन को दिये अपने महत्वपूर्ण भाषण में किया. इस तरह परमाणु बमों का प्रभाव तो उन पर पड़ा ही था. इस भाषण का ही यह प्रभाव था कि अनामी आगे कुछ और नहीं कर पाए.

यह बहस तो चलती ही रहेगी.

रणनीतिक फ़ैसला

 यह वास्तव में रुस के साथ एक रेस थी. इस बम से विश्व भर में अमरीकी श्रेष्ठता की घोषणा होनी थी.
प्रोफ़ेसर मार्क सैलडन

हमले की 60वीं बरसी पर लंदन में ग्रीनपीस संस्था की ओर से आयोजित एक बैठक में न्यूयार्क के बिंगाम्टन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्क सैलडन ने ट्रूमैन के निर्णय के पीछे की रणनीति पर ज़ोर दिया.

उनका कहना है, "ऐसा माना जा रहा था कि परमाणु बम गिराए जाने से युद्ध का अंत कुछ इस तरह से होगा जो एशिया क्षेत्र में अमरीका की सामरिक स्थिति को बड़े पैमाने पर मज़बूत प्रदान करेगा".

उन्होने आगे लिखा है, "यह वास्तव में रुस के साथ एक रेस थी. इस बम से विश्व भर में अमरीकी श्रेष्ठता की घोषणा होनी थी. इस हमले से जापान के विरुद्ध होने वाली रुसी बढ़त भी रुकती और ऐसी स्थिति पैदा होती, जैसी कि पैदा हुई भी, कि जापान पर क़ब्ज़े में अमरीकी प्रभुत्व साफ दिखाई देता".

उधर डेविड मैकक्लाग ट्रूमैन के उद्देश्यों की सीधे-सीधे कुछ इस तरह से व्याख्या करते हैं.

"यदि जापान पर धावा बोलने के बाद हुई भारी बर्बादी और ख़ून-ख़राबे के बाद यह सामने आता कि युद्ध को समाप्त करने के लिये पर्याप्त हथियार मौजूद होते हुए भी उनका इस्तेमाल नहीं किया गया था तो, अमरीकी राष्ट्रपति या इस निर्णय को लेने से जुड़े दूसरे लोग अमरीकी जनता को क्या जवाब देते."

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