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शुक्रवार, 01 जुलाई, 2005 को 11:33 GMT तक के समाचार
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सेवा शुल्क, टिप, नज़राना या घूस...

लागोस की इमारतें
लागोस नाइजीरिया की व्यापारिक राजधानी है
कुछ वर्षों के लिए नाइजीरिया जाने की बात सुनकर भारत में लोगों ने मुझसे इतनी सहानुभूति जताई थी कि मुझे लगने लगा था कि नाइजीरिया जाना सियाचिन जाने से कम जोख़िम भरा नहीं है. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है.

नाइजीरिया की व्यापारिक राजधानी लागोस कई द्वीपों पर बसा शहर है, जो लंबे लंबे पुलों से जुड़ा है.

सड़कों पर हर तरह की छोटी बड़ी विदेशी गाड़ियाँ नज़र आतीं हैं लेकिन इनमें से अधिकांश यूरोपीय देशों से आयतित वो गाड़ियाँ हैं जिन्हें वहां ‘स्क्रैप’ कहा जाता है.

यहाँ की कुछ सड़कों की हालत देख कर लगता है कि शायद बढ़िया कारें यहां की सड़कों को सह भी न पाएं. लेकिन हाल के वर्षों में सड़कों को दुरुस्त करने का काम सरकार की प्राथमिकताओं में से एक रहा है.

सड़कें

यहाँ जन परिवहन की सुविधा पूरी तरह से ओकाड़ा यानी मोटर साइकिलों पर टिकी है. लंबी दूरी के लिए छोटी बसें और टैक्सियां भी हैं. मज़े की बात यह है कि यातायात की इन सुविधाओं में किराया मोलभाव से तय होता है.

लागोस की सड़क
ट्रैफ़िक और सड़क की हालत अच्छी नहीं है

सड़कों पर ‘गो-स्लो’ या देसी भाषा में कहूँ तो जाम लगना आम बात है. इन ‘गो-स्लो’ के दौरान हर तरह का सामान बेचने वालों की भीड़ सड़क पर उतर आती है.

फल सब्ज़ियों से लेकर घड़ियाँ, सजावट का सामान, कपड़े तक बिकते नज़र आते हैं.
मोलभाव यहाँ भी करना पड़ता है, मुझे तो लगता है मोलभाव यहाँ की संस्कृति का हिस्सा है.

कई जगह पर “डिस्काउंट मांग कर शर्मिंदा न करें” जैसे लिखे वाक्य मुझे देखने को मिले, वैसे ही जैसे भारत में “उधार मांग कर शर्मिंदा न करें” के बोर्ड लगे रहते हैं.

कई जगह लोगों के चेहरे पर खिंची लकीरें देख कर मुझे लगा कि इनका बचपन शरारतों में बीता होगा, लेकिन बाद में बातचीत से पता चला कि यह जनजातीय निशान हैं जो बहुत बचपन में बच्चों के चेहरे पर खींच दिए जाते हैं.

‘ला-घूस’

सुरक्षा संबधी कुछ समस्याएँ अभी भी हैं, लेकिन यहाँ के लोगों का कहना है कि यह अब उतनी नहीं जितनी कुछ वर्षों पहले थी.

बच्चे फुटबॉल खेलते हुए
नाइजीरिया में फुटबॉल सबसे लोकप्रिय खेल है

हाँ, टिप, सेवा शुल्क या घूस चाहे जो भी कह लें, उसे बुरा नहीं माना जाता वैसे भी भष्टाचार के मामले में नाइजीरिया का स्थान उपर ही आता है.

लागोस के बारे में एक भारतीय ने मुझसे मज़ाक में कहा कि यहाँ इनती रिश्वतख़ोरी हैं कि इसका नाम ‘ला-घूस’ होना चाहिए.

नाइजीरियाई लोग फुटबॉल के दीवाने तो हैं ही धीरे-धीरे यहाँ क्रिकेट भी लोकप्रिय हो रहा है.

औरतों का श्रृंगार प्रेम तो जगजाहिर है ही, लेकिन यहां की कामकाजी औरतें अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बालों की सजावट पर ख़र्च कर देतीं हैं.

बालों में बनावटी लटें लगाने और उन्हें सेट करवाने का ख़र्च 150 से 2000 रुपए के बीच आता है जबकि नाइजीरिया के लोगो की औसत आमदनी लगभग 450 रुपए महीना है.

पीने के पानी और बिजली की किल्लत तो यहाँ रहती ही है. लेकिन पेट्रोल पानी से सस्ता है.प्रति लीटर पेट्रोल की क़ीमत लगभग पंद्रह रुपए के बराबर है जबकि पानी की एक बोतल का दाम बीस रुपए है.

लागोस में रहते हुए ऐसा नहीं लगता कि आप भारत से इतनी दूर हैं. लागोस में लगभग 50 हज़ार प्रवासी भारतीय रहते है. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर तो हैं ही होली, दीवाली, नवरात्र और ईद जैसे त्यौहार भी ज़ोरशोर से मनाए जाते हैं.

लेकिन इन सबके साथ साथ मुश्किलें, परेशानियां, किल्लतें, कूड़ा, सड़कें और भष्टाचार भी भारत को भूलने नहीं देते.

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