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फ़लस्तीनी क्षेत्र में मृत्युदंड बहाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क़रीब तीन साल बाद फ़लस्तीनी क्षेत्र में किसी को मौत की सज़ा दी गई है. अदालत में हत्या की बात स्वीकार करने वाले चार लोगों को रविवार को मौत की सज़ा दे दी गई. इनमें से तीन लोगों को फाँसी दी गई जबकि एक व्यक्ति को फ़ॉयरिंग स्क्वैड ने गोली मारी. अंतरराष्ट्रीय दवाब के कारण इन लोगों की मौत की सज़ा टाल दी गई थी. फ़लस्तीनी प्रशासन के एक प्रवक्ता ने बताया कि क़ानून का राज स्थापित करने के लिए मौत की सज़ा बहाल की गई है. बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि फ़लस्तीनी प्रशासन को सबसे ज़्यादा सहायता राशि देने वाला यूरोपीय संघ इसका विरोध कर सकता है. मानवाधिकार संगठनों ने भी मौत की सज़ा बहाल किए जाने को ख़तरनाक बताया है. फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने फरवरी में ही संकेत दे दिए थे कि मौत की सज़ा बहाल की जाएगी. मंज़ूरी गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता तौफ़ीक़ अबू हौसा ने बताया कि महमूद अब्बास ने शनिवार को मौत की सज़ा बहाल किए जाने को मंज़ूरी दे दी.
हौसा ने बताया, "फ़लस्तीनी क्षेत्र में क़ानून की बिगड़ती स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अब नयी नीति लागू की जा रही है." 1994 में फ़लस्तीनी प्रशासन के गठन के बाद से अभी तक नौ लोगों को मौत की सज़ा दी गई है. 2002 में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण यासिर अराफ़ात ने इस पर रोक लगा दी थी. फरवरी में महमूद अब्बास ने यरूशलम के मुफ़्ती-ए-आज़म शेख़ इकरिमा साबरी को मौत की सज़ा के बारे में इस्लामी क़ानून की राय जानने के लिए अधिकृत किया था. मुफ़्ती-ए-आज़म साबरी को 51 मामलों की समीक्षा करने को कहा गया था. बाद में उन्होंने मौत की सज़ा बहाल किए जाने की सिफ़ारिश की और कहा कि इसमें देरी से फ़लस्तीनी समुदाय में बदले की भावना बढ़ती है. |
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