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मंगलवार, 18 जनवरी, 2005 को 03:09 GMT तक के समाचार
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ज़ाओ का निधन और चीनी मीडिया
ज़ाओ ज़ियांग
सरकार को डर है कि चीन में सुधारवादी कदमों के लिए फिर आंदोलन शुरू हो सकता है.
ज़ाओ ज़ियांग के निधन के बाद चीन में इस बात की माँग तेज़ हो गई है कि वह 1989 के छात्र आंदोलन के दमन पर फिर से नज़र डाले और उसकी फिर से विवेचना करे.

ज़ाओ के सचिव बाओ तोंग ने इसकी माँग की है जबकि कई लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने इसका समर्थन किया है.

उधर ताइवान और जापान ने चीन से कहा है कि वह लोकतंत्र की ओर क़दम बढ़ाए.

चीन ने इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं दी है मगर इस ख़बर को यथासंभव दबाने की कोशिश हो रही है.

वहीं चीन ने ज़ाओ ज़ियांग के घर और त्येनआनमन चौक के इर्द-गिर्द सुरक्षा बढ़ा दी है. संवाददाताओं के अनुसार अधिकारियों को डर इस बात का है कि ज़ाओ के निधन से एक बार फिर सुधारवादी प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं.

पार्टी के पूर्व नेता को प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सैनिक ताक़त का इस्तेमाल करने का विरोध करने के बाद पद से हटा दिया गया था.

चीनी मीडिया

अगर चीन में मीडिया में इस ख़बर की चर्चा की बात करें तो चीन की सरकारी समाचार एजेंसी की ओर से ज़ाओ ज़ियांग के निधन की ख़बर देना एक तरह से चीन में बढ़ते हुए खुलेपन की और झुकाव दिखाता है.

इसके अलावा चीन के अधिकारियों की ओर से ये एक तरह से इस बात को मानने जैसा भी था कि अब इंटरनेट और चौबीसों घंटे की ख़बरों की दुनिया में इस तरह की ख़बर को छिपाना संभव नहीं होगा.

मीडिया पर पाबंदी

मगर फिर भी सरकार ने हर वो क़दम उठाया जिससे वह ज़ाओ ज़ियांग के इस निधन के महत्त्व को चीन में कम करके दिखा सके.

सिर्फ़ चीन के सरकारी टेलीविज़न या रेडियो पर ही अगर किसी ने भरोसा किया हो तो उसे तो उनके निधन के बारे में शायद पता भी नहीं चला हो क्योंकि उन्हें इस बात की ताक़ीद की गई थी कि वे शिन्हुआ की ख़बर को प्रसारित न करें और उन्होंने ऐसा नहीं ही किया.

इस तरह की भी ख़बरें हैं कि सीएनएन या जापान के एनएचके की ओर से दी जा रही ज़ाओ ज़ियांग के निधन की ख़बरों को भी चीन में प्रसारित नहीं होने दिया गया.

अख़बारों और पत्रिकाओं को उनके निधन की ख़बरें छापने की अनुमति दी गई है और उनकी वेबसाइटों ने भी इसे प्रसारित किया.

पीपल्स डेली या सिना जैसी लोकप्रिय समाचार वेबसाइटों पर चैट के लिए जो फ़ोरम हैं वहाँ पर लोगों ने अपने संदेश लिखे हैं.

एक संदेश था कि इतिहास उनके प्रति सही फ़ैसला करेगा जबकि पीपल्स डेली पर एक व्यक्ति का सवाल था कि आख़िर हम एक मृत व्यक्ति का शोक क्यों नहीं मना सकते.

इंटरनेट पर मौजूद सभी ऐसे सभी संदेश, फिर वो उनके निधन पर अफ़सोस व्यक्त करने वाले हों या अधिकारियों की आलोचना वाले, सभी संदेश मिटा दिए गए हैं जो दिखाते हैं कि चीन में और खुलेपन की ओर बढ़ते क़दम अब भी काफ़ी नपे-तुले ही हैं.

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