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चुनाव का शांति प्रक्रिया पर असर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महमूद अब्बास की आसान जीत को मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया में नई जान फूँकने के एक अनोखे अवसर के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन अवसर जो भी हो इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि इसराइल और फलस्तीनियों के बीच शांति प्रक्रिया की रूपरेखा को लेकर मतभेद क़ायम हैं. महमूद अब्बास जैसे व्यावहारिक व्यक्ति के फ़लस्तीनी राष्ट्रपति बनने का मतलब है - इसराइल अब ये कह नहीं पाएगा कि फ़लस्तीनियों में ऐसा कोई विश्वसनीय आदमी है ही नहीं जिससे वो बातचीत कर सकें. लेकिन सवाल ये है कि ये बातचीत हो किस बारे में, क्या इसका मक़सद वो हो जो फ़लस्तीनी चाहते हैं यानी स्थायी शांति समझौते के लिए जल्द से जल्द बातचीत की तरफ़ बढ़ा जाए. या फिर ये बातचीत इसराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन की इच्छा के मुताबिक़ हो, यानी प्रक्रिया धीरे धीरे आगे बढ़े जिसमें कुछ अंतरिम व्यवस्थाएँ हों. फ़ौरी तौर पर तो दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि सुरक्षा के मामले में जल्द प्रगति होनी चाहिए, ऐसी प्रगति जो ज़मीन पर दिखाई भी दे. इसराइलियों के लिए इसका मतलब होगा आत्मघाती बम हमलों का अंत और ग़ज़ा पट्टी से देश के दक्षिण में होने वाले मिसाइल हमले भी रुक जाएँगे. और फ़लस्तीनियों के लिए इसका मतलब होगा – इसराइली पाबंदियों का स्थायी तौर पर हटना जिससे वो अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बिना रोक-टोक के बिता सकेंगे. लेकिन सुरक्षा के मसले पर तत्काल समझौता भी आसान नहीं होगा, इसके लिए नए फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास को फूँक-फूँक कर क़दम रखने होंगे और कट्टर फ़लस्तीनियों को किसी तरह के युद्धविराम के लिए राज़ी करना होगा. दूसरी तरफ़, इसराइली फ़ौज को भी बेहद संयम से काम लेना होगा. साथ ही, इसके लिए बाहर से भी बहुत भारी समर्थन बल्कि दबाव की ज़रूरत होगी. अपने दूसरे कार्यकाल में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश मध्य पूर्व की इस शांति प्रक्रिया में कितना हाथ बँटाना चाहते हैं, इसकी भी परीक्षा होगी. नए फ़लस्तीनी नेतृत्व के लिए आर्थिक और अन्य मदद पर विचार करने के लिए लंदन में कुछ हफ़्तों में एक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय बैठक भी होने जा रही है. लेकिन ये बात भी तय है कि सुरक्षा स्थिति में अस्थायी सुधार फ़लस्तीनियों को लंबे समय के लिए संतुष्ट नहीं कर सकता. हो सकता है कि ग़ज़ा से हटने की इसराइली योजना पर अमल भी अब दोनों पक्षों के बीच समन्वय से हो जाए. लेकिन सवाल ये है कि उसके बाद क्या होगा. फ़लस्तीनी आश्वस्त होना चाहते हैं कि आख़िरकार जो मुद्दे उनके लिए अहम हैं उन्हें भुला न दिया जाए जैसे – शिविरों में रह रहे शरणार्थी और अलग देश के रूप में मान्यता. |
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