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फ़लस्तीनी संघर्ष का ख़ामोश सिपाही | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नवंबर में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात की मृत्यु के बाद महमूद अब्बास को फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन यानी पीएलओ का अध्यक्ष चुना गया था. और जनवरी में वे फ़लस्तीनी राष्ट्रपति चुनाव में बड़े अंतर से जीत गए हैं. 69 वर्षीय महमूद अब्बास उदारवादी नेता माने जाते हैं. उनके बारे में पहले से ही ये कहा जा रहा था कि वे यासिर अराफ़ात के उत्तराधिकारी के रूप में चुने जाने के प्रमुख उम्मीदवार होंगे. अब्बास को फ़लस्तीनियों के राजनीतिक गुट फ़तह का समर्थन प्राप्त थे और वे शुरू से ही दौड़ में सबसे आगे चल रहे थे. अब्बास को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ-साथ इसराइल का भी समर्थन हासिल था. जो इस पद पर किसी उदारवादी नेता की नियुक्ति चाह रहे थे. महमूद अब्बास मई 2003 में फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रधानमंत्री बने थे लेकिन चार महीने बाद ही उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. सत्ता संघर्ष प्रधानमंत्री के रूप में उनकी नियुक्ति से इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया (जिसे रोड मैप के नाम से जाना जाता है) के आगे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन हमास और इसराइल के साथ जारी संघर्ष के बीच महमूद अब्बास की एक न चली और वे किनारे कर दिए गए.
फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात के साथ उनका सत्ता संघर्ष भी चला. अराफ़ात उन्हें महत्वूर्ण अधिकार सौंपने को राज़ी नहीं थे. लेकिन अराफ़ात की मृत्यु के बाद महमूद अब्बास फ़लस्तीनियों के नेता बन कर उभरे हैं. महमूद अब्बास का जन्म 1935 में ब्रितानी उपनिवेश रहे फ़लस्तीन के साफ़ेद नगर में हुआ था. अब्बास पीएलओ के प्रमुख राजनीतिक गुट फ़तह के जीवित बचे संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. 1950 के दशक में निर्वासित होकर क़तर में रह रहे अब्बास ने फ़लस्तीनियों के संघर्ष के लिए एक संगठन तैयार किया. जिसके सदस्य बाद में पीएलओ के प्रमुख सदस्य बने. उसके बाद अब्बास ने यासिर अराफ़ात के साथ मिलकर फ़तह का गठन किया और निर्वासन के दौरान उनके साथ जॉर्डन, लेबनॉन और ट्यूनिशिया में रहे. आंदोलन के शुरुआती दिनो में वे अपने साफ़-सुथरे और सरल जीवन के कारण काफ़ी सम्मानित थे.ॉ महमूद अब्बास ने पढ़ाई-लिखाई भी खूब की है. उन्होंने मिस्र में क़ानून की शिक्षा पाने के बाद मॉस्को में पीएचडी किया. उन्होने कई क़िताबें भी लिखी हैं. नेटवर्क महमूद अब्बास को हमेशा पृष्ठभूमि में ही रखा गया लेकिन उन्होंने ख़ुफ़िया सेवाओं और अरब नेताओं के साथ अच्छे संबंध बना लिए. इसी कारण 1970 के दशक में उन्हें पीएलओ के लिए कोष जुटाने और सुरक्षा मामलों का ज़िम्मा भी सौंपा गया जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया. 1980 में उन्हें पीएलओ के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग का प्रमुख भी नियुक्त किया गया था. महमूद अब्बास को एक व्यवहारिक व्यक्ति माना जाता है. उन्हें इसराइली वामपंथियों के साथ बातचीत शुरू करने की पहल करने वालों में प्रमुख व्यक्ति माना जाता है.
ओस्लो शांति प्रक्रिया के पीछे उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है. ओस्लो शांति समझौते पर हस्ताक्षर के समय वे यासिर अराफ़ात के साथ व्हाइट हाउस में मौजूद थे. अब अराफ़ात का उत्तराधिकारी चुने जाने के बाद विभिन्न चरमपंथी गुटों से निपटना उनके लिए आसान नहीं होगा. कई चरमपंथी गुटों ने तो चुनाव का ही बहिष्कार किया था. तो कई प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका मांग रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन हासिल करने के बाद अब्बास को यह दिखाना होगा कि वे चरमपंथियों को क़ाबू में करना चाहते हैं और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना. उन्होंने चरमपंथी गुटों से अपील भी की है कि वे इसराइल के ख़िलाफ़ हथियारबंद आंदोलन ख़त्म करें. लेकिन उनकी अपील कितनी कारगर होगी- यह तो आने वाला समय ही बताएगा. |
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