|
यूक्रेनः पूरब और पश्चिम की लड़ाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोवियत संघ जब टूटा तो यूक्रेन को अचानक आज़ादी मिल गई मगर तब वहाँ ऐसे स्थानीय लोग थे ही नहीं जो शासन चला सकने के योग्य हों. नतीजा, हुआ ये कि जो स्थानीय कम्युनिस्ट नौकरशाह थे उन्होंने अपने हिसाब से व्यवस्था कर ली और इसमें क्षेत्रीयता का प्रभाव दिखने लगा. यूक्रेन में पूर्वी और पश्चिमी हिस्से का प्रभाव बिल्कुल अलग है. पूर्वी हिस्से में कोयले की खानें थीं और इस्पात बनता था और वहाँ के जो अमीर उद्योगपति थे वे लंबे समय से सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने की इच्छा प्रदर्शित करते रहे थे. यूक्रेन के निवर्तमान राष्ट्रपति लियोनिद कुचमा ख़ुद इससे अछूते नहीं हैं और अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने क्षेत्रीयता का सहारा लिया और उनको एक-दूसरे से भिड़वाते रहे. नतीजा यूक्रेन दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में बदल गया. विपरीत सोच वाले उम्मीदवार
अब जो वहाँ राष्ट्रपति चुनाव हुए हैं उसमें जो दो उम्मीदवार हैं उनकी स्थानीय पूँजीपतियों के बारे में सोच बिल्कुल ही विपरीत है. चुनाव लड़ रहे प्रधानमंत्री विक्टर यानूकोविच स्वयँ पूँजीपतियों के कुनबे से आते हैं इसलिए उनका वो सदा ख़याल रखेंगे. मगर विपक्षी नेता विक्टर युशचेन्को का एक तो पूँजीपतियों में कोई प्रभाव नहीं है और दूसरा उन्होंने कह रखा है कि वे सत्ता में उनके प्रभाव पर रोक लगाम लगाएँगे. ऐसे में यूक्रेन में चुनाव के बाद पूर्व और पश्चिम का ये मतभेद खुलकर सामने आ गया है. सेंटर ऑफ़ यूरोपियन रिफ़ॉर्म नाम संस्था से जुड़ी यूक्रेन मामलों की विशेषज्ञ कातिंका बारीष मानती हैं कि अभी हो या बाद में दोनों ही पक्षों को आपस में बात करनी ही होगी. कातिंका बारीष कहती हैं,"इस चुनाव से दो तथ्य बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहे हैं. पहला ये कि चुनाव साफ़-सुथरा नहीं था और दूसरा ये कि देश बँटा हुआ है. पूर्व में यानुकोविच तो पश्चिम में यूश्चेंको का प्रभाव है. ऐसे में एकमात्र रास्ता ये है कि दोनों पक्षों को आपस में बात करनी होगी." रूस की मुश्किल यूक्रेन में चुनाव के बाद जो हालात पैदा हो गए हैं उससे एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है रूस के सामने क्योंकि यूक्रेन में जीत उसी की होती थी जिसे रूस का वरदस्त हासिल हो. अब इस बार रूस ने विक्टर यानूकोविच को हर तरह से मदद दी और यहाँ तक हुआ कि रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने यानूकोविच को नतीजा घोषित होने के पहले ही बधाई तक दे डाली. मगर बाद में शर्मिंदा होते हुए कहा कि अभी कहना जल्दबाज़ी होगी कि जीता कौन. लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जिस तरह से यूक्रेन चुनाव में धाँधली के ख़िलाफ़ रूख़ अपनाया है उसमें अगर प्रधानमंत्री विक्टोर यानूकोविच जीते तो रूस के यूरोपीय संघ और अमरीका से रिश्तों में फूट पड़ सकती है. लेकिन अगर विपक्षी नेता यूश्चेंको जीते तो ये पुतिन के लिए एक व्यक्तिगत हार साबित होगी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||