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उजाले के लिए छटपटाता रेडियो:अचला शर्मा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कोई बीस-पच्चीस कहानियां, गिनी चुनी कविताएँ और कुछ रेडियो नाटक- बस इतना सा साहित्यिक सफ़र है मेरा. मैं ख़ुद बरसों पहले के अपने लेखन को पढ़ती हूँ तो संकोच होता है. साल दो साल में एक कहानी लिखी जाती है. लेखक मित्रों से नज़र चुरानी पड़ती है. कवि गोष्ठियों में इसलिए नहीं जाती क्योंकि सुनाने के लिए कोई नई कविता पास नहीं होती. कब तक मूल पर सूद वसूल किया जा सकता है..... और ऐसे में पद्मानंद साहित्य सम्मान...! शायद यह सबसे कठिन समय होता है जब सबकी नज़रें आप पर टिकी हों और आप से अपेक्षा की जाए कि आप को जो सम्मान दिया गया है उसे आप सही ठहराएँ. यानी यह सिद्ध करें कि आपने महान साहित्य का सृजन किया है. साथ में यह भी सिद्ध करने की कोशिश करें कि परख करने वाली जूरी से कहीं कोई ग़लती नहीं हुई है. बहरहाल, जिन रेडियो नाटकों की वजह से आप से दो बातें करने का अवसर मिला है वो ग़मे दुनिया-ग़मे रोज़गार की श्रेणी में आते हैं. रेडियो में नौकरी करने का फ़ायदा यह हुआ कि अचानक कुछ कहने का मंच मिल गया. और यूँ आरंभ हुई रेडियो नाटकों की मेरी यात्रा. आकाशवाणी से लेकर बीबीसी हिंदी सेवा तक के सफ़र में जो देखा, जो सुना, जो पाया, वह रेडियो नाटकों में रुपांतरित होता गया. ‘सास भी कभी बहू थी’ के आविष्कार से पहले मन्नू भंडारी के 'आपका बंटी' या भीष्म साहनी के 'साग मीट' जैसे नाट्य रूपांतर रेडियो पर राज करते थे. यह वो दौर था जब 'घर-घर की कहानी', प्रेमचंद की 'सवा सेर गेहूँ' या 'कफ़न' जैसी कहानियों के बग़ैर अधूरी थी. तब मैं रेडियो से चिपकी, रेडियो के अस्तित्व का लोहा माना करती थी. यह निश्चय कर चुकी थी कि अच्छे साहित्य को आम जन तक पहुँचाने के में, उसकी रूचि-अभिरूचि को तराशने में रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है. मेरा विश्वास था कि अगर घर-घर तक, घर-घर की कहानी पहुँचानी है तो रेडियो जैसा सशक्त माध्यम दुनिया में दूसरा नहीं है. शायद आप सोचें कि कितना ग़लत सोचती थी. लेकिन मेरा वह विश्वास आज भी बरक़रार है कि रेडियो के वो दिन भारत में फिर लौटेंगे. पिछले दिनों जब भारत से ख़बर आई कि प्राइवेट एफ़.एम. चैनल भी रेडियो नाटकों में रूचि ले रहे हैं तो लगा कि रेडियो के तरंग भरे दिन लौट रहे हैं. पर जब भारत गई और एफ़.एम. रेडियो सुना तो पाया कि वहाँ भी टेलीविज़न सीरियलों का ही साउंड ट्रैक बज रहा है. मुझे टेलीविज़न सीरियलों से कोई शिकायत नहीं. शिकायत है तो उनसे जो रेडियो की स्पेस पर भी क़ब्ज़ा करने लगे हैं और नहीं जानते यह अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है. हाल में जाने माने कथाकार और नाटककार विष्णु प्रभाकर जी का बधाई पत्र मुझे मिला. उन्होंने यह पत्र मुझे पद्मानंद साहित्य सम्मान दिए जाने का समाचार पढ़ कर लिखा. याद दिलाया कि रेडियो नाटक उनका प्रिय विषय रहा है. मुझे याद है कि एक समय था जब विष्णु प्रभाकर और अन्य बड़े लेखक रेडियो के लिए विशेष रूप से नाटक लिखकर स्वयं को धन्य मानते थे. फिर लेखक बंधु टेलीविज़न के लिए लिखने लगे. और क्यों न लिखते? एक और नया सशक्त माध्यम उनके लिए दरवाज़े खोल रहा था. लेकिन 'हम लोग', 'तमस' और 'कक्का जी कहिन' जैसे धारावाहिकों ने टेलीविज़न पर नाटकों की जो स्वस्थ परंपरा डालने की कोशिश की थी वह कब की लुप्त हो गई. और उसके साथ लुप्त हो गया आम आदमी, लुप्त हो गई आम औरत. मगर टीआरपी रेटिंग के इस दौर में किससे गिला किससे शिकवा! आज हर चैनल पर धड़ाधड़ फ़िल्म छाप सीरियल दिखाए जा रहे हैं. लगभग हर सीरियल उच्च मध्य वर्ग की सद्य अर्जित समृद्धि से छलछलाती नारी का एक ऐसा चेहरा पेश करता है जो या तो दूसरी नारी के ख़िलाफ़ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले षड्यंत्र में डूबा है अथवा तुलसी के बिरवे और करवा चौथ के फ़िल्म जात ग्लैमर से पुता हुआ है. कहने का मन होता है कि है टेलिविज़न सीरियल लेखकों, हिंदी फ़िल्मों के बासी सपने ताज़ा करके बेचने से अच्छा है साबुन बेचो. फिर जानती हूँ, जवाब आएगा कि साबुन बेचने के लिए ही तो सीरियल बनाते हैं. उनका तर्क है कि मार्केट फ़ोर्सेज़ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, ये बाज़ार ख़रीदार का बाज़ार है. मतलब परिवर्तन तब तक संभव नहीं जब तक आप यानी ख़रीदार न चाहें. या जब तक आप अपने आप से ये सवाल न करना चाहें कि क्या भारत केवल बड़े-बड़े शहरों में बसता है? या क्या पूरा भारत आईटी सॉफ़्टवेयर से झंकृत हो रहा है? या महानगरों के बाहर का 70 प्रतिशत भारत कैसे गुज़र बसर करता है? कितना चमकदार या शाइनिंग है ये भारत? हाल में हुए चुनावों ने ये स्पष्ट कर दिया है कि मुट्ठी भर महानगरों के आकाश की चमक को देखकर लगाया गया नारा ज़मीन पर कितना खोखला साबित होता है. मैं समझती हूँ कि टेलीविज़न और रेडियो जैसे जनसंचार माध्यमों की एक व्यापक भूमिका है. उससे वे ज़्यादा समय तक मुँह नहीं मोड़ सकते. भारत में रेडियो कुछ दशकों तक टेलीविज़न के ग्रहण से ग्रस्त रहने के बाद उजाले में आने के लिए छटपटा रहा है. अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश कर रहा है जो तब तक संभव नहीं है जब तक उसे सही अर्थों में जनसंचार माध्यम नहीं बनने दिया जाता. यानी वह माध्यम जो समाचार और सामयिक चर्चाओं के साथ साथ ज्ञान, मनोरंजन और साहित्य का संस्कार देने में समर्थ हो. मुझे आशा है भारत में एफ़एम के सामने इस समय जो सीमाएँ हैं उनके दूर होते ही रेडियो नए सिरे से अपने लिए मुहावरा तलाश करेगा. और ये रेडियो पर नाटकों की एक नई शुरुआत के लिए शुभ होगा. (बीबीसी हिंदी सेवा की अध्यक्ष अचला शर्मा ने शनिवार 26 जून को लंदन के नेहरू सेंटर में अपने रेडियो नाटक संग्रहों के लिए पद्मानंद साहित्य सम्मान ग्रहण करते समय अपना ये वक्तव्य रखा.) |
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