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आठ दिन बाद चाय मांगी
"चाय!" नब्बे साल की शहरबानो मज़ंदरानी के मुँह से आठ दिन में यह पहला शब्द निकला. आठ दिन से वह मलबे के नीचे दबी हुई थीं और ईरान के शहर बाम में विनाशकारी भूकंप के बाद राहत कार्य में लगे लोगों को उनका जीवित बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं लगा. सूँघने वाले कुत्तों ने उनका पता लगाया और राहतकर्मियों ने जब मलबा हटाया तो उन्हें एक दुबला-पतला, कमज़ोर सा हाथ हिलता नज़र आया. रेड क्रीसेंट की एक प्रवक्ता का कहना है, "उनके चेहरे पर एक भी खरोंच तक नहीं थी". वह बच इसलिए गईं क्योंकि उनके आसपास लकड़ी की बल्लियाँ कुछ इस तरह गिरीं कि उन्होंने एक सुरक्षा कवच सा बना लिया और ईंटें और पत्थर उन्ही पर टिके रहे.
डॉक्टरों का कहना है कि उनकी कोई हड्डी नहीं टूटी है और शहरबानो अपने बच जाने पर कहती हैं, "ख़ुदा ने मेरी हिफ़ाज़त की". विशेषज्ञों का कहना है कि किसी का तीन दिन के बाद बिना खाए-पिए बच जाना एक अनहोनी सी बात है. रेड क्रीसेंट की प्रवक्ता का कहना है कि शहरबानो मज़ंदरानी सवालों के जवाब दे रही हैं और पूरे होशोहवास में हैं. जब उन्हें चाय की प्याली थमाई गई तो उनका कहना था, "इतनी गरम नहीं. थोड़ा रुक कर देना". |
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