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चीन-पाक दोस्ती का मतलब
आजकल चीन अपनी नई नीति के तहत सभी देशों से दोस्ती निभाता नज़र आ रहा है. कम-से-कम पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की मौजूदा चीन यात्रा और वहाँ के घटनाक्रमों से तो कुछ ऐसा ही लग रहा है. मगर पाकिस्तान के लिए चीन की इस दोस्ती का मतलब समझ पाना मुश्किल लगता है. परवेज़ मुशर्ऱफ़ को नए चीनी राष्ट्रपति से मुलाक़ात के पहले दिन ही ये आशा थी कि वे पाकिस्तान में एक परमाणु ऊर्जा संयत्र लगाने के मामले में चीन के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर कर लेंगे.
उस दिन यूँ तो दोनों देशों के बीच आठ अलग- अलग समझौते हुए लेकिन इस ऊर्जा संयंत्र के बारे में कोई ठोस क़दम नहीं उठाया जा सका. कूटनीतिज्ञों का कहना है कि दोनों देश इस बारे में बातचीत कर रहे हैं, हालाँकि अब तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान ने चीन की मदद से पहले भी एक परमाणु ऊर्जा संयत्र लगाया है. शक्ति संतुलन का समीकरण पाकिस्तान को अपने मित्र देश चीन की 'दोस्ती की परिभाषा' तब और उलझी हुई लगने लगी जब ये समाचार मिला कि चीन भारत के साथ एक संयुक्त सैनिक अभ्यास की योजना बना रहा है.
चीन ने पिछले महीने पाकिस्तान के साथ भी नौसेना अभ्यास किया था और लगातार उसे आश्वस्त करता है कि चीन और पाकिस्तान की दोस्ती अलग तरह की है. चीन के बिजींग विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर झू फ़ेंग का कहना है,"पाकिस्तान की चिंता का कारण चीन और भारत के बीच संबंधों की मधुरता है." उन्होंने बीबीसी को बताया," चीन के पाकिस्तान के साथ पारंपरिक संबंध बरकरार हैं और ये चाहता है कि पाकिस्तान क्षेत्र में शांति की बहाली में भारत के प्रयासों में उसका साथ दे." दरअसल, चीन के पाकिस्तान के साथ संबंध लंबे समय से लगातार अच्छे दिखते रहे हैं. इसका एक महत्वपूर्ण कारण दोनों देशों को भारत और उसके सहयोगियों से दिखने वाला ख़तरा था. लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति और ख़ासकर 11 सितंबर के बाद क्षेत्र में शक्ति संतुलन का समीकरण बदलता हुआ दिख रहा है. अब चीन भारत के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के पक्ष में है. भारत के दैनिक ' द हिंदू' के कूटनीतिक मामलों के संपादक राजा मोहन का कहना है," चीन को आने वाले समय में क्षेत्र में व्यापार, राजनीति और सैन्य संबंधों को लेकर अपने पक्ष को एकदम स्पष्ट करना चाहिए." उल्लेखनीय है कि भारत और चीन ने आपस में पिछले महीने उच्च स्तरीय बातचीत की थी जिसमें कश्मीर और अरूणाचल प्रदेश की सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश की गई. हाल में एक सकारात्मक बात ये सामने आई है कि चीनी मीडिया ने अब भारत के पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम को भारत के बाहर के राज्य के रूप में दिखाना बंद कर दिया है. विशेषज्ञों का आकलन चीन और भारत के बीच व्यापार संबंध फ़िलहाल विश्व में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले संबंधों में से हैं. राजा मोहन का मानना है,"भारत चाहता है कि चीन पाकिस्तान को परमाणु और मिसाइल संबंधी तमाम तकनीक मुहैया कराने में वैसा ही नियंत्रण लगाए जैसा वो उत्तर कोरिया के मामले में करता है." वैसे चीन का नया नेतृत्व परमाणु निरस्त्रीकरण के मामले में काफ़ी दिलचस्पी लेता नज़र आ रहा है. चीन ने अमरीका और कई क्षेत्रीय शक्तियों से इस बारे में बातचीत के प्रयास भी शुरु किए हैं. हाल के दिनों में चीन का कूटनीतिक और आर्थिक प्रभाव लगातार बढ़ता हुआ सा दिख रहा है.
कुछ विशेषज्ञों की राय है कि चीन परमाणु मामले में पाकिस्तान पर उत्तर कोरिया की तरह कुछ दबाव बना सकता है, ख़ासकर तब जब अमरीका भी ऐसा चाहता है. लेकिन इतना तो साफ़ है कि चीन पाकिस्तान के साथ राजनितिक और सैन्य संबंध बिगाड़ना नहीं चाहेगा. दूसरी तरफ़ अमरीका और जापान भारत के साथ अपनी निकटता को बनाए रखना चाहेंगे ताकि चीन-पाकिस्तान की संयुक्त शक्ति को संतुलित किया जा सके. सूरत-ए-हाल इन तमाम समीकरणों के बावजूद मौजूदा हाल ये है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के चीनी सहयोग से एक परमाणु ऊर्जा संयत्र लगाने की संधि पर हस्ताक्षर हो भी सकते हैं. बिजींग विश्वविद्यालय के ही प्रोफ़ेसर झू फ़ेंग का कहना है," इस मामले में चीन फ़िलहाल बहुत सक्रियता इसलिए भी नहीं दिखा रहा है क्योंकि उसे अंतरर्राष्ट्रीय प्रहरियों की रोक टोक का ख़तरा है." इस बात में कोई संदेह नहीं है कि परवेज़ मुशर्रफ़ का तालेबान पर प्रभाव और इस्लामी अलगाववाद पर क़ाबू पाने की उनकी कथित क़ाबिलियत के दावों के कारण चीन पाकिस्तान को अपना मित्र बनाए रखना चाहेगा. चीनी टेलीविज़न के अनुसार पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने सोमवार को चीन में आतंकवाद और पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी आँदोलन के ख़िलाफ़ लड़ने की घोषणा की. शक्ति के निरंतर बदलते समीकरणों पर तो ख़बरें आती ही रहेंगी लेकिन फ़िलहाल लगातार फैलती चीनी मित्रता से माहौल में कुछ मिठास तो ज़रूर दिखती है. |
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