
विकास के लिए बिजली चाहिए और बिजली बनाने के लिए कोयला.
अब तक ‘कोलगेट’ को हम दाँतों की सफाई करने वाले पेस्ट के रूप में जानते रहे हैं.
पर अब लाखों करोड़ रुपए के कथित कोयला घोटाले को अखबार और टेलीविजन चैलन ‘कोलगेट’ के नाम से पुकार रहे हैं.
क्या विडंबना है कि भारत के कई देहाती इलाकों में अब भी कई लोग रोजाना सुबह कोलगेट से नहीं बल्कि कोयले से अपने दाँत साफ करते हैं.
और ‘कोलगेट’ 1,86,000 करोड़ रुपए के कोयला घोटाले का पर्याय बन चुका है.
दुनिया भर के पत्रकार घोटालों के आगे ‘गेट’ जोड़कर उनकी गंभीरता को जाहिर करने की कोशिश करते हैं. क्योंकि सत्तर के दशक में अमरीका में हुए वॉटरगेट कांड के कारण राष्ट्रपति निक्सन को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया था.
विपक्ष अडिग है कि ‘कोलगेट’ पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफा लेकर ही मानेगा.
काँग्रेस कहती है कि भारतीय जनता पार्टी संसद में बहस से मुँह चुरा रही है क्योंकि अगर बहस हुई तो कई रहस्यों से पर्दाफाश होगा.
इसी उहापोह में संसद का मानसून सत्र ‘कोलगेट’ की भेंट चढ़ गया लगता है.
सरकार की मानें तो कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है.
सरकारी तर्क
"अगर खदानों से कोयला निकालने का अधिकार नीलामी के जरिए दिया जाता तो सब कुछ स्पष्ट रहता."
प्रंजय गुहा ठाकुरता
उनका तर्क बड़ा सीधा सादा है: भारत को विकास के लिए बिजली चाहिए और उसके लिए भारी मात्रा में कोयले की ज़रूरत है.
चीन भारत से पाँच गुना ज्यादा कोयला पैदा कर रहा है और प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए भारत को भी ज्यादा कोयला पैदा करना होगा. इसके लिए जितनी पूँजी, मैनपावर और तकनॉलॉजी की जरूरत पड़ती है, वो सरकार के बस से बाहर है.
निजी कंपनियाँ तभी इतनी बड़ी रकम लगाने को तैयार होंगी जब उन्हें मुनाफे की गारंटी मिले क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक एक खदान के लिए जंगल साफ करने आदि में ही 75 करोड़ से ज्यादा खर्च हो जाते हैं.
पर तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.
आर्थिक मामलों के जानकार प्रंजय गुहा ठाकुरता मानते हैं कि कोयला, लोहा, प्राकृतिक गैस, स्पेक्ट्रम आदि संपदा पूरे देश की है. सरकार अगर सचमुच आम आदमी के हित में काम करती है तो उसकी कोशिश होनी चाहिए कि फायदा आम आदमी को हो.
लेकिन जिस कोयला घोटाले के कारण मनमोहन सिंह की सरकार की जान सांसत में आई है, उसमें पारदर्शिता से काम नहीं लिया गया.
ठाकुरता कहते हैं कि कुछ अफसरों और नेताओं ने एक कमरे में बैठकर तय कर लिया कि किस कंपनी को कोयला खदाने दी जाएँ और किसे नहीं.
उन्होंने कहा, अगर खदानों से कोयला निकालने का अधिकार नीलामी के जरिए दिया जाता तो सब कुछ स्पष्ट रहता.
सवाल है कि क्या सरकार पूँजीपतियों के लिए काम कर रही है या आम आदमी के लिए?
सत्तर के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार ने कोयले का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था ताकि प्राकृतिक संपदा का फायदा किसी एक कंपनी या व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज को मिले.
अब जमीन के नीचे की संपदा के खनन का अधिकार निजी कंपनियों को दिया जा चुका है और उनका ये अधिकार तब तक बना रहेगा जब तक लाइसेंस रद्द नहीं किए जाते.
सवाल दर सवाल

सीएजी कहता है कोयला खदान आवंटन में सरकार को लाखों करोड़ रुपए का घाटा हुआ है.
प्रंजय गुहा ठाकुरता कहते हैं कि कोयला खनन के अधिकार देने की प्रक्रिया कई सवाल खड़े करती है.
मसलन उस कंपनी को कोयला खनन अधिकार कैसे मिल गए जिसमें केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय के भाई निदेशक हैं?
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के भाजपा मुख्यमंत्रियों ने भी इस या उस कंपनी की सिफारिश की है.
ठाकुरता इसे एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखते हैं.
उनका मानना है कि ये समस्या एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमरीका सहित तीसरी दुनिया के लगभग सभी देशों की समस्या है.
विकासशाल देशों में विकास के नाम पर सरकारें और कंपनियाँ मिलकर आम लोगों के जल, जंगल और जमीन छीन रही हैं.
इससे लोगों की जीविका जाती है, जंगल जाते हैं पर उन्हें कोई फायदा नहीं होता.
पर इतने विवाद और संसद में मची खींचतान के बाद आखिर में निकलेगा क्या? क्या कुछ बड़े लोगों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ेगा? क्या 2-जी की तर्ज पर कुछ बड़े जेल भेजे जाएँगे? सबसे अहम सवाल है कि ‘कोलगेट’ की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस्तीफी देंगे?
इन सभी सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं.









