
यह काहिरा में होस्नी मुबारक के जाने के बाद पहला रमजान था. एक ऐसा रमजान जिसमें जनता की चुनी हुई इस्लामी झुकाव वाली पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड सत्ता में है.
लोग आम तौर पर एक जनतांत्रिक सरकार से ख़ुश हैं लकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इस बात की चिंता है कि कहीं यह मिस्र में धर्मनिरपेक्षता के अंतिम दिन ना सबित हों.
काहिरा के मध्य में, तहरीर चौक से ज़रा दूर, एक बार या मयखाने के भीतर बैठा मैं मिस्र की ठंडी बीयर का स्वाद ले रहा हूँ.
यह बार शोर-गुल, धुएं और भीड़ से भरा हुआ है. यहाँ आने वालों में बूढ़े ईसाई लोग हैं, उदारवादी मुसलमान हैं और स्वयंभू क्रांतिकारी हैं और विदेशी पत्रकार हैं.
"जब लोग शराब पीते हैं तो उनका दिमाग ख़राब हो जाता है और वो सडकों पर हंगामा करते हैं.लोगों को अपने घरों में शराब पीने की आज़ादी होना चाहिए पर सरकार को शराबखाने तो बंद कर ही देना चाहिए"
अहमद, एक आम युवा
यहाँ आने वाले लकड़ी की चरमराती टेबलों और कुर्सियों के चारों तरफ़ बैठे रहते हैं. इस बीच एक मोटा सा खुर्राट शक्ल का शराब परोसने वाला आदमी अपनी बाहों में बीयर की बोतलें भरे चारों तरफ़ घूम रहा है और उन लोगों के हाथों में बोतलें थमाता जा रहा है जो इसकी तरफ़ लपक रहे हैं.
मिस्र में रमजान के पूरे महीने में शराबखाने बंद रहते हैं. रमजान के पूरे महीने लोग दिन भर उपवास करते हैं , रात भर दावतें उड़ाते हैं और देर रात तक टीवी देखते हैं बस शराब नहीं पीते.
पर हालात बदल रहे हैं
मिस्र के लोगों ने अपने आधुनिक इतिहास में पहली बार एक इस्लामी झुकाव वाली पार्टी के हाथों में सत्ता सौंप दी है.
शराबखाने में बैठे मेरे जैसे कई लोग इस बात पर कयास लगा रहे हैं कि जाने कितने दिन तक काहिरा में शराबखाने बचे रह पाएगें.

बहुत से लोग मानते हैं कि शराब मिस्र के राष्ट्रपति मुर्सी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर नहीं है
वैसे काहिरा में शराब पीना कोई कठिन नहीं है. यहाँ चारों तरफ़ पर्यटन के लिए मौजूद होटलों में और क़रीब दर्ज़न भर शराबखानों में शराब आसानी से मिलती है. आम तौर पर शराबखानों में शराब सस्ती होती है.
अगर आप अपने घर के बाहर शराब पीना नहीं जाना चाहते तो किसी भी गैरकानूनी शराब विक्रेता को फोन करें और वो फ़ौरन अपनी मोपेड के पीछे बंधे डब्बे में शराब लेकर आपके दरवाज़े पर अवतरित हो जाएगा.
ऐसा नहीं है कि मिस्र में शराब कोई विदेशी या नई चीज़ हो. मिस्र में सबसे ज़्यादा बिकने वाली शराब स्टेला अपनी बोतलों पर लोगों को अभिमान के साथ बताती है कि वो मिस्र में बीते 115 सालों से लोगों की सेवा कर रही हैं.
एक शराबखाने के मालिक ने मुझे ध्यान दिलाया था कि स्टेला मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड से भी 30 साल बड़ी है.
वैसे मिस्र में शराब का एक प्राचीन इतिहास भी है. क़रीब 2200 ईसा पूर्व की एक मिस्री कहावत में कहा गया है कि "सबसे खुश आदमी का मुहँ बीयर से भरा होता है."
पर यह भी मानना होगा कि एक आधुनिक काहिरा में इस बात को नज़रंदाज़ करना असंभव है कि मिस्र की इस्लामी सभ्यता यहाँ समाज की जड़ों में रचती बस्ती है.
परंपरावादी राष्ट्र
मिस्र एक परंपरावादी राष्ट्र है.
"मुझे यह पसंद नहीं कि कोई मुझे बताए मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं. मैं किसी भी ऐसे देश में नहीं रहना चाहता"
हसन
यहाँ कहीं भी नज़रें उठाईए आपको एक न एक मस्जिद दिख ही जाएगी, हर गली के नुक्कड़ पर, पुलों के नीचे इमारतों के तहखानों में इस्लाम मिस्र के ताने बाने में बुना है.
अपनी उम्र के तीसरे दशक को छूने की तैयारी कर रहे एक युवा अहमद ने मुझसे एक बार कहा था "जब लोग शराब पीते हैं तो उनका दिमाग ख़राब हो जाता है और वो सडकों पर हंगामा करते हैं.लोगों को अपने घरों में शराब पीने की आज़ादी होना चाहिए पर सरकार को शराबखाने तो बंद कर ही देना चाहिए."
अहमद ना कट्टरपंथी सलाफी मुसलमान हैं ना ही वो मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थक हैं पर उनके माथे पर नमाज़ के बाद सर ज़मीन पर घिसने से बना काला निशान इस बात की गवाही देता है कि वो धर्म में आस्था रखने वाले मुसलमान हैं.
और भी हैं ज़माने में...
पर अहमद और उनकी तरह के लाखों लोग मानते हैं कि राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी के शराब के कानून पर गौर करने से ज़्यादा बड़े मसले हैं.
मसलन देश की अर्थव्यवस्था और देश में सेना के हाथ से नागरिक सरकार के हाथों में सत्ता हस्तांतरण.
मुस्लिम ब्रदरहुड भी देश में अपने आर्थिक और राजनीतिक सुधारों को लेकर अपनी योजनाओं के चलते व्यस्त हैं और उनके एजेंडे पर शराब या बिकनियों से जुड़े सामाजिक नियम भी सबसे ऊपर नहीं दिखते.
पर देश में मौजूद धर्म निरपेक्षतावादियों के लिए परंपरावादी राजनीतिज्ञों का शराब के प्रति रुख यह साबित करने के लिए काफी है कि वो अपने धार्मिक एजेंडे को किस हद तक लागू करना चाहते हैं.
मेरे एक 22 साल के नौजवान मित्र हसन कहते हैं शराब से जुड़े कानूनों का अर्थ उनके लिए यह नहीं है कि वो शराब के नशे में धुत्त हो सकते हैं या नहीं उनके लिए यह आजादी का मामला है.
हसन कहते हैं, "मुझे यह पसंद नहीं कि कोई मुझे बताए मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं. मैं किसी भी ऐसे देश में नहीं रहना चाहता."








