कोरोना वायरस हमारे शहरों की सूरत कैसे बदल रहा है - दुनिया जहान

अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर. कहा जाता है कि क़रीब 80 लाख की आबादी वाला ये शहर कभी सोता ही नहीं. कहीं जोश, कहीं उत्साह, कहीं झंकार तो कहीं शोर.

ये आवाज़ें न्यूयॉर्क की पहचान के साथ जुड़ी रही हैं. लेकिन कोविड-19 ने यहां बहुत कुछ बदल दिया. बीते साल जब लॉकडाउन लगा तब गलियों में सन्नाटा पसर गया. चुप्पी टूटती थी तो सिर्फ़ एंबुलेंस की आवाज़ से.

फिर अचानक हैरान करने वाले बदलाव सामने आए. टैक्सियों और कारों के हॉर्न और न्यूयॉर्क के बाशिंदों के शोर के बजाए चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देने लगी.

न्यूयॉर्क से इतर, दुनिया के दूसरे शहरों में भी लॉकडाउन लगते ही क़ुदरत मुस्कुराने लगी. रियो डि जेनेरो हो या फिर काहिरा, हर कहीं दुर्लभ पक्षी दिखने लगे.

कारों का शोर ग़ायब हुआ और हवा साफ़ हो गई थी. रात के वक़्त आसमान में जगमगाते सितारे नज़र आने लगे थे. जब लॉकडाउन हटा तो हाल बदला लेकिन फिर जब कभी बंदिशें लगीं तो प्रकृति की हंसी सुनाई दी.

और, इससे ही जन्मा सवाल कि क्या कोविड-19 हमारे शहरों की सूरत बदल देगा? हमने इसे समझने के लिए चार विशेषज्ञों से बात की जिन्होंने इस सवाल का जवाब हमें समझाने की कोशिश की.

पार्ट-1: नया दुश्मन

हमारी पहली एक्सपर्ट बिएट्रिज़ कोलोमिना अमेरिका की प्रिंसटाउन यूनिवर्सिटी में वास्तुशिल्प की प्रोफ़ेसर हैं.

वो कहती हैं, "मैं अपनी तमाम उम्र बीमारियों को लेकर आसक्त सी रही हूं. मेरे माता-पिता टीबी और टाइफ़ाइड बुख़ार जैसी बीमारियों के बारे में जानकारी जुटाते रहे. ये बीमारियां अब भी तमाम लोगों की जान ले रही है."

बीमारियों के बारे में जानने की दीवानगी ने ही प्रोफ़ेसर कोलोमिना की रिसर्च को दिशा दी. उनके शोध का विषय था 'द रिलेशनशिप बिटवीन डिज़ीज़ एंड सिटीज़' यानी बीमारियों और शहरों के बीच का रिश्ता.

बीती शताब्दी में बड़ी आबादी की फ़िक्र बढ़ाने वाली बीमारी टीबी यानी तपेदिक हैज़ा की तुलना में अलग क़िस्म की बीमारी थी. ये हवा के ज़रिए फैलती थी.

दुनिया के हर सात में से एक शख़्स को टीबी की बीमारी थी. पेरिस जैसे घनी आबादी वाले शहरों में हर तीन में से एक आदमी इस बीमारी की चपेट में था. शहरों की घनी बसावट की वजह से ये बीमारी जंगल की आग की तरह फैली.

प्रोफ़ेसर कोलोमिना बताती हैं कि आर्किटेक्ट और प्लानिंग के विशेषज्ञों ने इसका तोड़ निकालने की कोशिश की.

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में आला वास्तुविद ला कार्बूज़िए ने पेरिस में आमूलचूल बदलाव का सुझाव दिया.

प्रोफेसर कोलोमिना के मुताबिक वो 19वीं शताब्दी की वास्तु को बदलने की बात कर रहे थे.

वो बताती हैं कि कार्बूज़िए के भवन निर्माण की शैली से ज़ाहिर होता है कि उन्होंने इसे टीबी को ध्यान में रखते हुए तैयार किया. भवन कॉलम के सहारे ज़मीन से ऊपर उठाकर तैयार किए गए ताकि बीमारी फैलने से रोका जा सके. टैरेस बनाए गए ताकि धूप मिल सके.

वो आधुनिक शहर बनाने के साथ-साथ टीबी के ख़ात्मे की तैयारी भी कर रहे थे.

लेकिन क्या टीबी और कोरोना वायरस महामारी के बीच भी कोई समानता तलाशी जा सकती है और क्या इस महामारी का भविष्य में तैयार होने वाले शहरों पर कोई असर दिख सकता है?

प्रोफेसर कोलोमिना कहती हैं, "टीबी को घर से जुड़ी दिक्कत माना जाता था और अभी हम घर में क्वारंटीन हैं. यानी दिक्कत की वजह घर से बाहर समझी जा रही है. हमें घर में रहने की सलाह दी जा रही है. घरों को सुरक्षित जगह बताया जा रहा है. और जो दुश्मन है वो सार्वजनिक जगहों पर है. शहर में है."

जब दुश्मन बाहर था तो लाखों लोगों की दुनिया घरों तक सिमट गई. कई लोगों के लिए घर ही वर्कप्लेस यानी दफ़्तर बन गए.

प्रोफ़ेसर कोलोमिना कहती हैं कि कोविड महामारी की वजह से घर से काम करने का चलन बढ़ा है.

"अगर निकट भविष्य के शहरों की बात करें तो ये काफी अलग नज़र आ सकते हैं. मुझे नहीं पता कि अभी के तमाम दफ़्तरों का क्या होगा? लेकिन आपको कुछ अलग सोचना होगा."

प्रोफ़ेसर कोलोमिना ये भी कहती हैं कि बदलाव घरों में भी होगा. वहां काम करने की जगह बनानी होगी. वास्तुकारों को एक ही छत के नीचे रहने और काम करने की जगह की कल्पना करनी होगी. ये दौर आना भले ही बाकी हो लेकिन कोविड-19 शहरों को बदलने लगा है.

पार्ट-2: संकट का समाधान

पेरिस के डिप्टी मेयर जीन लुई मिसिका हमारे दूसरे विशेषज्ञ हैं. वे कहते हैं, "शहर पूरी तरह से खाली था. कोई कार नज़र नहीं आ रही थी. आमतौर पर शहर में जिनसे माहौल बनता है वो दुकानें, बार और रेस्तरां बंद थे."

जीन लुई मिसिका हमें बता रहे थे कि कोविड-19 की वजह से जब शहर में करीब आठ हफ़्ते तक लॉकडाउन लगाया गया तो क्या हाल था. वो कहते हैं कि ये सब आसान नहीं था लेकिन मुश्किल के वक़्त लोगों की खूबियां बाहर आती हैं.

लॉकडाउन हटाए जाने के बाद उन्होंने साइकिल चलाने को बढ़ावा देने का फ़ैसला किया. पेरिस की मेयर की सहमति के बाद कुछ सड़कों पर कारों की आवाजाही बंद कर दी गई और इसका असर भी दिखा.

वे कहते हैं, "शहर के जो लोग आवाजाही के लिए अंडरग्राउंड सेवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे, उनके लिए बाइक अच्छा विकल्प थी. हमने आपातकालीन स्थिति को देखते हुए ऐसा किया और एक रात में बाइक लेन तैयार कर दी. इसकी कामयाबी के बाद हम इसे स्थायी तौर पर लागू करने का इरादा बना रहे हैं."

पेरिस की सूरत बदलने के लिए तैयार '15 मिनट सिटी' योजना की टीम में जीन लुई भी शामिल थे.

वो बताते हैं, "आप अपने घर से पैदल निकले हों या फिर साइकिल पर. 15 मिनट के चलने के दौरान ही आपको वो तमाम सुविधाएं या सेवाएं हासिल हो जाती हैं, जिनकी आपको तलाश है. मसलन आपको किसी डॉक्टर के पास जाना हो, स्कूल जाना हो, पार्क जाना हो या फिर खाने-पीने का सामान खरीदना हो."

जीन लुई कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था शुरू हुई और ये आगे भी बनी रहेगी. ये भी '15 मिनट सिटी' परिकल्पना का हिस्सा है. पेरिस में अभी काफी लोग शहर के पूर्वी हिस्से में रहते हैं और नौकरी शहर के पश्चिमी हिस्से में करते हैं. एक व्यक्ति को आमतौर पर घर से दफ़्तर तक पहुंचने में करीब 45 मिनट का समय लगता है. लेकिन अब ऑफिस की इमारतों को रिहाइशी भवन में बदलना होगा.

लेकिन क्या कोविड-19 संकट का भी इस योजना पर कोई असर हुआ है?

जीन लुई कहते हैं, "मुझे लगता है कि ये संकट भी एक अवसर है. हमें शहर के मूल ढांचे में बदलाव लाना है. हमने कोशिश की है कि लोगों के बीच सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग रहे. 15 मिनट सिटी योजना से शहर में मौजूद असमानता भी दूर होगी."

जीन लुई कहते हैं कि शहर के अमीर और ग़रीब इलाकों का अंतर सेवाओं और सुविधाओं से पता चलता है. अगर आप हर जगह बेहतर सुविधाएं मुहैया करा सकें तो असमानता को दूर करने में भी मदद मिलेगी.

पार्ट-3: घनी आबादी की चुनौती

डॉक्टर वैदेही टंडेल हमारी तीसरी विशेषज्ञ हैं. वो एक अर्थशास्त्री हैं.

वैदेही कहती हैं, "मैं इसी शहर में पैदा हुई और बड़ी हुई हूं. ये हमेशा से ही घनी आबादी वाला शहर रहा है."

वैदेही मुंबई के बारे में बात कर रही हैं. बीते साल कोविड-19 संक्रमण शुरू होने के बाद डॉक्टर वैदेही और उनके सहयोगियों ने मुंबई में संक्रमण के मामलों पर नज़र रखना शुरू किया.

उन्होंने गौर किया कि शुरुआत में ज़्यादा मामले मध्य और दक्षिण मुंबई में सामने आ रहे हैं. ये शहर के अपेक्षाकृत संपन्न इलाके थे. उनका कहना था कि बीमारी शुरुआत में ऐसे लोगों के बीच फैली जो देश या विदेश का दौरा करके लौटे थे.

कुछ हफ़्ते बाद शहर भर में फैली झुग्गी बस्तियों में कोरोना के मामले सामने आने लगे. शहर की सबसे चर्चित झुग्गी बस्ती धारावी में भी संक्रमण के मामले मिलने लगे. आंकड़ों के मुताबिक मुंबई की कुल आबादी के 42 फ़ीसदी लोग झुग्गी बस्तियों में रहते हैं.

वैदेही बताती हैं, "मुंबई के जनसंख्या घनत्व की बात करें तो ये करीब 32000 प्रति वर्ग किलोमीटर है. झुग्गियों में जनसंख्या घनत्व कहीं ज़्यादा है. मुंबई में दो-तीन कमरे के अपार्टमेंट में छह से सात लोग रहते हैं. पानी की पाइप लाइन सार्वजनिक होती है. सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करना होता है. कई बार इतना पानी भी उपलब्ध नहीं होता है कि लोग ठीक से हाथ साफ कर सकें. कई बार ये भी एक बड़ी चुनौती होती है."

मुंबई की बनावट और बसावट में पहले की महामारियों की भूमिका रही है. साल 1898 में बॉम्बे सिटी इंप्रूवमेंट ट्रस्ट बनाया गया था. इसके दो साल पहले शहर में प्लेग फैला था और बाद में ये ट्रस्ट बना.

वैदेही कहती हैं, "शहर में प्लेग जैसी महामारी पर रोक लगाई जा सके, इसकी योजना तैयार की गई. ट्रस्ट ने शहर की बेहतर साफ़ सफ़ाई और घर निर्माण की योजना तैयार की."

लेकिन तब से अब तक शहर की जनसंख्या बेतहाशा बढ़ गई है. आज मुंबई की आबादी दो करोड़ के करीब है.

डॉक्टर वैदेही का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी के बाद भी शहर में बदलाव देखने को मिल सकते हैं. सस्ते घर बन सकते हैं. गरीब इलाकों में साफ-सफाई की व्यवस्था बेहतर हो सकती है.

वो कहती हैं, "ये भी हो सकता है कि ग़रीब बस्तियों को शहर के बाहर कर दिया जाए. हालांकि इससे काम नहीं बनेगा. क्योंकि जब आप लोगों को बाहर भेज देंगे तो आप उन्हें रोज़ी रोटी से भी अलग कर रहे होंगे. ऐसे में उनके लिए गुज़र बसर करना मुश्किल होगा. इसलिए वो दोबारा शहर का ही रुख़ करेंगे और यहीं बसेंगे. यहां पैसे का कोई संकट नहीं है. मुंबई में देश की सबसे अमीर महानगरपालिका है. समस्या आगे के हिसाब से सोचने और उसके हिसाब से काम करने की है."

डॉक्टर वैदेही कहती हैं कि कुछ हद तक ये इसलिए नहीं हो पाता है कि शहर के जो नेता हैं वो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं हैं.

पार्ट-4: सोच में लोच

हमारे चौथे विशेषज्ञ संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ सलाहकार रिचर्ड सेनेट हैं. अमेरिका के शिकागो शहर में पले-बढ़े रिचर्ड सेनेट संयुक्त राष्ट्र को शहरों से जुड़े मामलों पर सलाह देते हैं.

साल 1967 में रिचर्ड जब यूनिवर्सिटी में थे तभी अमेरिका में नस्लीय दंगे हुए. उनका कहना है कि तभी समझ पाए कि कैसे कोई संकट एक शहर की पहचान को सामने लाता है.

रिचर्ड का कहना है कि नस्लीय दंगों में अफ्रीकी मूल के अमेरिकियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा. ये समुदाय गरीब होता गया. उनके घर छिनते गए. पुलिस उनका दमन कर रही थी. इस सबके बीच सवाल भी उठ रहे थे कि क्या शहर के स्तर पर कुछ किया जा सकता है. सोच ये थी कि घर और सार्वजनिक स्थान को कैसे डिज़ाइन किया जाए कि वहां रहने वालों को लगे कि न्याय की भावना बनी हुई है.

दंगे के कारणों की जांच के लिए कर्नर कमीशन बना. बीते साल जून में एक बार फिर कमीशन की रिपोर्ट चर्चा में आई जब अफ्रीकी मूल के जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस के हाथों हुई मौत के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुए.

रिचर्ड कहते हैं कि तब लगा कि 52 साल में कुछ भी नहीं बदला है.

अमेरिका के शहर अब न सिर्फ नस्लीय असमानता बल्कि कोविड-19 से भी जूझ रहे हैं.

रिचर्ड को उम्मीद है कि इस बार बदलाव देखने को मिल सकता है. वो उस सोच के हामी हैं जिसे कहा जाता है टैक्टिकल अर्बनिज्म.

रिचर्ड सेनेट कहते हैं, "मान लीजिए कि आप शहर में बाइक लेन बनाना चाहते हैं तो आपको बहुत ज़्यादा रकम की जरूरत नहीं होती है. बस आपको पेंट करके लेन बना देनी होती हैं. ये बहुत आसान है. यही टैक्टिकल अर्बनिज्म है जहां आप समझ से समाधान निकालते हैं. इसमें काफी लचीलापन है."

वो कहते हैं कि सिर्फ़ कोविड-19 से मुक़ाबले के लिए शहर को तैयार करने का कोई मतलब नहीं है.

"आने वाले दो या तीन साल में आपको कोविड-19 की वैक्सीन और दूसरे इलाज मिल जाएंगे और तब आज के मुकाबले शहर की सूरत कुछ अलग ही होगी. तीन साल बाद बीमारी पर हमारा ज़्यादा नियंत्रण होगा. ऐसे में हमें सिर्फ आज को ध्यान में रखकर बदलाव नहीं करने चाहिए."

उन्होंने 11 सितंबर के हमले के बाद न्यूयॉर्क में ऐसा ही कुछ होते देखा था. तब शहर को भविष्य के हमलों से बचाने की तैयारी होने लगी. वो कहते हैं कि ये ऐसी रणनीति है जिसमें कोई लोच नहीं दिखती है.

"न्यूयॉर्क की किसी इमारत में फिर कभी कोई विमान लेकर नहीं टकराया. हमें आने वाले ख़तरे की प्रकृति को समझते हुए योजनाएं बनानी चाहिए. खतरे बदल रहे हैं तो योजना में भी बदलाव होना चाहिए."

कोविड-19 का फैलाव रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग ज़रूरी है ऐसे में शहरों की प्लानिंग करने वाले ऐसी योजना बना सकते हैं जहां शहरों में आबादी कम हो.

लेकिन प्रोफ़ेसर रिचर्ड का कहना है कि ऐसी स्थिति में ख़तरा ये है कि जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को अनदेखा कर दिया जाए जबकि दोनों पर एक साथ ग़ौर करने की ज़रूरत है.

वो ये भी कहते हैं कि हो सकता है कि जो बात लंदन और पेरिस में काम कर जाए वो मुंबई जैसे ज़्यादा घनी आबादी वाले शहर में काम न आए.

वो कहते हैं कि योजना बनाने के स्तर पर आपको ज़्यादा लचीलापन दिखाना होगा. हर जगह एक ही फॉर्मूला चलाना ठीक नहीं होगा.

साफ़ है कि बीमारियों ने पहले भी शहरों की सूरत बदली है. चाहे वो प्लेग हो, हैज़ा हो या फिर टीबी हो.

आज हमारे सामने कोरोनावायरस है.

कुछ शहरों ने सोशल डिस्टेंसिंग आज़माना शुरू कर दिया है. कई जगह घरों से ही दफ्तरों का काम हो रहा है. सड़कों पर कारें कम दिख रही हैं. हवा भी साफ हो रही है और चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देने लगी है.

ये बदलाव स्थाई हों इसके लिए कल्पनाशील नेतृत्व और संसाधन दोनों की ज़रूरत होगी लेकिन ये दोनों ही बहुतायत में नहीं मिलते हैं.

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