शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का जाना एक नहीं, कई युगों का अंत है

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- Author, हिमांशु बाजपेयी
- पदनाम, दास्तानगो और लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए
कहते हैं- मौत से किसको रुस्तगारी है (कौन बच सका है), आज वो, तो कल हमारी बारी है. मगर हिन्दुस्तानी अदब की दुनिया पर शम्सुर्रहमान फारूक़ी साहब की मौजूदगी का असर ऐसा था कि कभी ख़याल ही नहीं आता था कि वो दिन भी आएगा, जब वो नहीं रहेंगे.
उनको देखो तो एक आदमी नहीं दिखाई देता था बल्कि नज़र आता था कि जैसे ज्ञान का कोई महासागर लहरा रहा है या इल्म का कोई हिमाला है जो अपने अनगिनत उच्च शिखरों के साथ हमेशा से क़ायम है और हमेशा क़ायम रहेगा.
उनकी शख़्सियत मानो कई सदियों पर फैली है. उनके आर-पार आती-जाती है. जब वो मीर पर, ग़ालिब पर, आचार्य मम्मट पर, कालिदास पर, मुंशी नवल किशोर पर, मोहम्मद हुसैन जाह पर बात करते थे या लिखते थे तो लगता था कि जैसे ये सब उनके समकालीन थे, मानो उनके क़रीबी और अज़ीज़ हैं.
ये बात जो अमूमन अतिशयोक्ति-सी लगेगी सिर्फ़ एक ही शख़्स के लिए सच हो जाती है, वो थे शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी. वो एक ऐसे आलोचक, कहानीकार, संपादक और शायर थे जिन्होंने उर्दू के साहित्य और इतिहास को अपने अंदर ज़िंदा कर लिया था.
सैकड़ों सालों की शानदार संस्कृति फारूक़ी साहब के अंदर सिर्फ़ सांस नहीं लेती थी बल्कि पूरी ऊष्मा के साथ अपनी ज़िंदगी का जश्न मनाती थी, उसका ऋृंगार करती थी. ऐसा लगता था कि फ़ारूक़ी साहब हमेशा से थे, हमेशा रहेंगे. पर वो नहीं रहे.

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सरस्वती सम्मान से सम्मानित
अदब की दुनिया को फ़ारूक़ी साहब का इस क़दर योगदान है कि उसके ठीक-ठीक मूल्यांकन में बहुत वक़्त और मेहनत लगेगी. वो हर रंग में है, हर हुनर में गहरा है. उनकी सबसे पहली पहचान आलोचक की है.
उर्दू आलोचना के पास एक से बढ़कर एक नाम रहे हैं, मगर बहुत से लोग ये मानते हैं कि फारूक़ी इनमें सर्वश्रेष्ठ हैं. ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर पर चार वॉल्यूम में उनका ज़बरदस्त काम शेर-ए-शोर अंगेज़ किसी साधना-सा लगता है.
मीर ख़ुदा-ए-सुख़न हैं, बहुत लोकप्रिय हैं. हमेशा से आलम पर छाए हुए हैं, उनके शेर कलेजे में खुपे जाते हैं लेकिन मीर को क़ायदे से समझना है तो फारूक़ी साहब को पढ़ना अनिवार्य है क्योंकि जैसा उन्होने मीर को समझा है और फिर समझाया है वैसा कोई नहीं कर सका.
फ़ारूक़ी से पहले और उनके बाद में सैकड़ों आलोचकों और विद्वानों ने मीर पर काम किया है लेकिन उर्दू के सबसे अज़ीम शायर को समझने का सबसे पुख्ता हवाला फ़ारूक़ी साहब ही माने जाते हैं.
मीर पर इस महान आलोचनात्मक काम के लिए ही उनको सरस्वती सम्मान दिया गया था. आलोचना के क्षेत्र में वो कई दशक पहले ही उस मंज़िल पर पहुंच चुके थे जहां उनका कहा हर्फ-ए-आख़िर की हैसियत रखता था.

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'उर्दू का इब्तेदाई ज़माना'
उनमें हैरान करने वाला इल्म, लियाक़त और ज़हानत तो थी ही, कई लोगों को हज़म न होने वाले तेवर और कई बार बदमिज़ाजी की सरहद को छूती साफ़गोई और बेबाकी भी थी इसीलिए उनकी आलोचना पर कई बार वबाल भी उठता था.
अहमद मुश्ताक को फिराक़ से बड़ा शायर कहना हो या फिर यगाना चंगेज़ी को ख़राब शायर और फैज़ को मामूली शायर कहना हो, फारूक़ी साहब कहते हमेशा रहे और कहने के पीछे अपनी मज़बूत दलीलें भी पेश करते रहे.
उर्दू के शुरुआती इतिहास पर उनकी किताब 'उर्दू का इब्तेदाई ज़माना' (उर्दू का शुरुआती दौर) इस विषय पर सबसे महत्त्वपूर्ण किताब है जिसे उन्होने अपने ज़बरदस्त शोध और दलीलों से उर्दू के उद्भव और विकास से जुड़े कई भरम दूर कर दिए.
उर्दू को लश्करी ज़बान मानने वाली स्थापना से उनका विरोध था. वो उर्दू लफ़्ज़ को दिल्ली शहर के लिए इस्तेमाल किया हुआ लफ़्ज़ मानते थे. मुसहफ़ी से पहले शायरी में ज़बान के लिए उर्दू लफ़्ज़ नहीं मिलता था ऐसा उनका कहना था. उर्दू के इतिहास से जुड़े हर व्यक्ति को ये किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए.
उनका एक और योगदान शबख़ून पत्रिका के ज़रिए उर्दू साहित्य में आधुनिकता का स्थापित करना और नई बहसों को शुरू करना है. शबख़ून पत्रिका के ज़रिए फारूक़ी साहब ने प्रगतिशील आंदोलन की प्रवृत्तियों और मान्यताओं से सख़्त विरोध जताया था और उर्दू अदब को एक तरह से इनसे मुक्त कराने और नए तरह के साहित्य को लाने का अहद बांध लिया.

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दास्तानगोई को दी नई ज़िंदगी
एक ज़माने में शबख़ून में छप जाना भर किसी भी नए साहित्यकार के लिए साहित्यकार हो जाने की गारंटी मानी जाती थी. कई दशक तक ये उर्दू की नंबर वन मैगज़ीन रही. ये भी दिलचस्प है कि एक तरफ़ जहां उन्होने उर्दू में जदीद अदब को स्थापित किया वहीं दूसरी तरफ़ वो उर्दू के क्लासिक लिट्रेचर की गहराइयों में भी डूबते-उतराते रहे.
फारूक़ी साहब का एक हैरतअंगेज़ कारनामा कहानी सुनाने की प्राचीन कला दास्तानगोई के विषय में उनका गहन शोधकार्य भी है.
उनसे पहले तक दास्तानगोई एक ऐसा विषय थी जिसके बारे में सुना तो सबने था लेकिन उसके बारे में आलोचना की कोई व्यवस्थित और प्रामाणिक किताब नहीं थी जिसके ज़रिए इस भूले-बिसरे फ़न की अज़्मत और रुतबे का हलका भी अंदाज़ा होता.
फ़ारूकी साहब ने दास्तानगोई के तिलिस्म को फतेह करने में अपनी जान झोंक दी और जब ये काम पेश किया तो ऐसा किया कि लोग दंग रह गए. दास्तान-ए-अमीर हमज़ा के 46 वॉल्यूम्स जाने कहां कहां से लाकर इकट्ठा किए.

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लोकप्रियता और पहचान
कई कई दफ़ा उन्हे हर्फ़-ब-हर्फ़ पढ़ा और समझा. इतिहास, भूगोल, अतीत, वर्तमान सब... एक-एक किरदार, एक-एक प्लॉट, एक-एक कहानी, एक-एक टेक्निक, एक-एक एलिमेंट, एक-एक पहलू को जैसे फ़ारूकी साहब घोल कर पी गए हों. तभी जब ये काम आया तो ऐसा हुआ कि जैसे किसी जोगी ने दास्तानगोई में जान फूंक दी हो.
लेकिन उन्होने सिर्फ़ इस विषय में महान ग्रंथ लिखने भर से संतोष नहीं कर लिया बल्कि किताब से बाहर इसे दोबारा ज़िंदा करने और दोबारा इसकी लाइव परफॉरमेंस शुरू करने के लिए अपने भतीज़े महमूद फ़ारूकी को तैयार किया.
चूंकि दास्तानगोई के रिवाइवल की आधारशिला फ़ारूक़ी साहब का ज़बरदस्त एकेडमिक काम था इसीलिए ये विधा न सिर्फ़ ज़िंदा हुई बल्कि एक स्वतंत्र विधा के तौर पर स्थापित भी हुई और उसे लोकप्रियता और पहचान भी मिली.
आधुनिक दास्तानगोई उनके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकती. वो न होते तो दास्तानगोई का सिर्फ नाम होता, न दास्तानगोई होती, न उसकी कोई दास्तान होती.

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कई चाँद थे सरे आसमाँ
जब उनका नॉवेल आया तो जैसे अदब की दुनिया में एक ज़ोरदार धमाका हुआ. इस धमाके ने एक ऐसी आवाज़ पैदा की, बहुत देर तक इसके सिवा कुछ सुनाई ही नहीं दिया. एक ऐसी चकाचौंध पैदा की, जिससे अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दिया.
लोगों को हैरानी थी कि ऐसा गद्य भी लिखा जा सकता है, और वो भी एक आलोचक ऐसा लिखे क्योंकि आलोचकों के बारे में आम तौर पर लेखकों और पाठकों की लोकप्रिय राय यही होती है कि वो दूसरों के कामों की चीर-फाड़ तो कर सकते हैं लेकिन ख़ुद एक पन्ना भी क़ायदे का फिक्शन नहीं लिख सकते.
फ़ारूकी साहब ने अपने नॉवेल में एक गुज़रे हुए ज़माने और तहज़ीब को सचमुच जिंदा कर दिया. किताब खोलते ही आप एक अलग दुनिया अलग दौर में न सिर्फ़ पहुंच जाते हैं बल्कि इसके किरदार बन जाते हैं.
इस नॉवेल ने भी कई अदबी भरम तोड़े. ये कि 21वीं सदी में नॉवेल कौन पढ़ता है, ये कि 21वीं सदी में ऐतिहासिक नॉवेल कौन पढ़ेगा. ये कि इतना मोटा नॉवेल किस काम का. ये कि जो कहानी है वो आज के पाठकों को समझ ही नहीं आएगी और अगर आ भी गई तो लुभा नहीं सकेगी.
कई चांद थे सर-ए-आसमां इन सब ग़लतफहमियों को धुआं कर देता है. ओरहान पामुक ने इसे एक अद्भुत उपन्यास कहा है, सच कहा है. ये भी सच है कि इसे सिर्फ़ फारूक़ी साहब ही लिख सकते थे क्योंकि हमारे वक़्त में कोई और था ही नहीं जिसे इसके विषय और उस दौर के बारे में इतनी तफसील से मालूमात हो.

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हिन्दुस्तानी साहित्य का विशाल आसमान
एक चीज़ में ये नॉवेल उर्दू की क़दीम दास्तानों की याद दिलाता है- इसकी डिटेलिंग. इतनी बारीक, इतनी दिलफरेब और इतनी प्रमाणिक. दास्तानगोई का अध्ययन करने में फ़ारूकी साहब ने जो वक़्त और श्रम लगाया था, ऩॉवेल लिखते हुए भी वो काम आया होगा.
फारूक़ी साहब सिर्फ़ साहित्यकार भर नहीं थे. वो एक महफ़िल थे, एक संग्रहालय थे, एक यूनिवर्सिटी थे, एक गुज़रा हुआ ज़माना थे, एक जीती-जागती तहज़ीब थे, एक हैरानी थे, एक तहरीक थे और जाने क्या क्या थे.
उनकी ये बात भी छोटे शहर के लोगों में बहुत विश्वास भरती थी कि वो इलाहाबाद में रहकर भी हिन्दुस्तानी साहित्य के विशाल आसमान के शम्स बने रहे.
बड़े लोग जब दुनिया से जाते हैं तो कहा जाता है कि उनके न रहने से एक युग समाप्त हुआ है. लेकिन मैं ये कहता हूं कि फ़ारूक़ी साहब के न रहने से एक नहीं बल्कि कई-कई युग समाप्त हो गए हैं क्योंकि अपने ज्ञान और योगदान की विराटता में वो एक ही समय में कई युगों पर फैले थे. उन पर छाए हुए थे.
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