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बहरे होने के बाद भी बीथोवन कैसे रचते रहे जादुई संगीत
- Author, विलियम मर्केज
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
सात मई, 1824. वियना की एक संगीतमय शाम. शहर का अभिजात्य और कुलीन तबक़ा वियना के रॉयल कोर्ट थिएटर में मौजूद. सबको एक बेहद ख़ास मौक़े का इंतज़ार. ये मौक़ा था लुडविग वैन बीथोवन की नौवीं सिम्फ़नी के प्रीमियर का, जिसे संगीत की दुनिया में आज भी असाधरण घटना के तौर पर देखा जाता है.
हालांकि वहां लोगों की उम्मीदें काफ़ी ज़्यादा थीं. सिम्फ़नी को कंपोज़ करने वाले ने लंबे समय से कोई सिम्फ़नी नहीं बनाई थी, लेकिन वे पूरी तरह से चूके नहीं थे. बीथोवन पिछले 12 साल से स्टेज पर भी नहीं दिखाई दिए थे. लेकिन आख़िरकार वे स्टेज पर मौजूद थे. संगीत के इस महान दिग्गज ने पोडियम से अपने सबसे बड़े आर्केस्ट्रा के लिए मंच संभाला. यह एक ऐसा कंसर्ट था जो ना तो इससे पहले कभी हुआ था और ना ही बाद में हो पाया.
पहली बार सिम्फ़नी के फ़ॉरमैट में बदलाव किया गया ताकि उसमें मानवीय आवाज़ को भी शामिल किया जा सके. दर्शकों के सामने पीठ किए, बीथोवन ने संगीत को जादुई अंदाज़ में आगे बढ़ाया, उनका शरीर थिरक रहा था, संगीत के साथ उनके हाथ लहर में झूम रहे थे. वे एक तरह से संगीत में डूबे हुए थे, जब उनका शो पूरा हुआ तब भी उनके हाथ लहरा रहे थे, इसके बाद उनके समूह की अकेली महिला गायिका कैरोलिन एनगेर ने बढ़कर उन्हें दर्शकों के सामने कर दिया ताकि वे तालियों की गड़गड़ाहट को देख सकें. दरअसल बीथोवन तब तक पूरी तरह बहरे हो चुके थे.
वो यादगार रात
इस वाक़ये के बारे में कई लोगों ने लिखा है. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में संगीत की प्रोफ़ेसर और हाल में प्रकाशित बीथोवन की जीवनी 'बीथोवन: ए लाइफ़ इन नाइन पीसेज़' की लेखिका लौरा टुनब्रिज ने बीबीसी को बताया, "वे सिम्फ़नी के प्रीमियर के मौक़े पर पोडियम पर मौजूद थे. लेकिन उनके बग़ल में संगीत निर्देशक भी मौजूद था जो चीज़ों को संभाल रहा था क्योंकि तब तक लोगों को मालूम चल चुका था कि वे अब आर्केस्ट्रा को कंडक्ट नहीं करते."
लौरा टुनब्रिज के मुताबिक़, "उनकी एक भाव भंगिमा पर लोगों ने ख़ूब तालियां बजाई थीं क्योंकि वे उसे दोबारा सुनना चाहते थे."
यह एक अराजक शाम हो सकती थी. कार्यक्रम के कंपोज़र-कंडक्टर बहरे थे, यह प्रस्तुति आम प्रस्तुतियों की तुलना में लंबी और कठिन भी थी, ख़ास बात यह थी कि संगीतकार ने इसके लिए बहुत अभ्यास भी नहीं किया था.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज कहती हैं, "आश्चर्य यह था कि तैयारी में कमी होने के बावजूद यह इतना शानदार रहा."
मनोरंजन नहीं कला का रूप है संगीत
यह आयोजन एक तरह से बीथोवन के जीवन की कामयाबी और दुख, दोनों को एक साथ दर्शाने वाला पल था.
बीथोवन का जन्म 250 साल पहले जर्मनी के बॉन में हुआ था. हालांकि उनका जन्म कब हुआ था इसको लेकर अनिश्चितता है, कुछ लोगों के मुताबिक़ उनका जन्म 16 दिसंबर को हुआ था लेकिन दस्तावेज़ों के मुताबिक़ उनका जन्म 17 दिसंबर, 1770 को हुआ था.
आगे चलकर वह असीम कल्पना, जुनून और ताक़त भरी धुनों के संगीतकार बने, जो उनके जटिल और विरोधाभासी शख़्सियत से मेल खाने वाला रहा. जब वे संगीतकार बनने के दौर से गुज़र रहे थे तब नेपोलियन के युद्ध का दौर था, राजनीतिक तौर पर यूरोप उथलपुथल के दौर से गुज़र रहा था.
बीथोवन का जन्म हालांकि जर्मनी में हुआ था लेकिन उन्हें वियना के एक प्रसिद्ध संगीतकार परिवार ने गोद ले लिया. वे उस शहर में पहुँच गए जहां से वुल्फगेंग एमत्योस मोत्जार्ट, जोसेफ हायडन, फ्रांच सुबर्ट और एंटोनियो विवाल्डी जैसे संगीत दिग्गजों का रिश्ता रहा है.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज ने बताया, "उन्होंने कई तरीक़ों से संगीत में क्रांतिकारी बदलाव किए ख़ासकर साउंड और वोल्यूम के हिसाब से. उनका विचार था कि संगीत के ज़रिए भी विचार और मनोभावों को व्यक्त किया जा सकता है. उनका यह भी मानना था कि संगीत शुद्ध मनोरंजन भर नहीं है बल्कि यह कहीं गहरा एहसास है."
टुनब्रिज के मुताबिक़ संगीत को कलात्मक प्रारूप का दर्जा दिलाने में बीथोवन की भूमिका अहम रही. हालांकि इसी दौर में उनकी पहचान ग़ुस्सैल, स्वार्थी, आत्ममुग्ध, लोगों से मिलने जुलने में दिलचस्पी नहीं रखने वाले, ज़िद्दी, रोमांटिक तौर पर हताश, कुंठित, कंजूस, अपने स्वास्थ्य के प्रति ज़्यादा चिंता करने वाले और शराब के नशे में डूबे रहने वाले संगीतकार की भी बनती गई.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज ने बताया, "यह बीथोवन से जुड़े रोमांटिक मिथकों का हिस्सा है. लेकिन हमलोग उस कलाकार की छवि को पसंद करते हैं जो अपने आंतरिक दुष्टताओं और शारीरिक बीमारियों से पीड़ित रहा."
उनकी पहचान उस दिग्गज कलाकार के तौर पर ही बनी जिन्होंने अपना पूरा जीवन कला को समर्पित कर दिया, जिनमें हमारी कल्पना से परे जाकर संगीत रचने की क्षमता थी और यही बात उन्हें अलौकिक बनाती है.
ख़राब स्वास्थ्य का असर
बीथोवन की प्रतिष्ठा मुश्किल चरित्र वाले संगीतकार की बन चुकी थी - लेकिन तटस्थता से देखें तो वे ताउम्र स्वास्थ्यगत मुश्किलों से घिरे रहे, कई बार कठिन उपचार के दौर का सामना भी किया. बीथोवन किन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे थे, इसका पता लगाने की कोशिश आधुनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी की है, उनकी बीमारियों का उनके बहरेपन से क्या संबंध था, इस पर भी खोजबीन हुई है. इतना ही नहीं उनकी बीमारियों ने उनकी शख़्सियत और संगीत की दुनिया पर कैसा असर डाला, इसकी भी विशेषज्ञों ने पड़ताल की है.
ब्रिटिश न्यूरोसर्जन हेनरी मार्श ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की डॉक्यूमेंट्री 'डिसेक्टिंग बीथोवन' में दिखाई गई बीथोवन की बीमारियों की विस्तृत सूची तैयार की. उनके मुताबिक़ महान संगीतकार बीथोवन की आंत और पेट की समस्या से ग्रसित थे, उनकी आंतों में सूजन थी, पाचन तंत्र ठीक नहीं था, तेज़ दस्त, पोषक तत्वों को पचाने में मुश्किल, भीषण अवसाद, चिंता के साथ न्यूरो सिस्टम में भी गड़बड़ी थी.
बीथोवन का निधन 27 मार्च, 1827 को हुआ था. उस वक़्त के मशहूर फ़िज़िशियन जोहानेस वेगनर ने उनकी ऑटोप्सी की. इस जाँच में उन्होंने बीथोवन के पेट में सूजन और लीवर को क्षतिग्रस्त पाया था. आम लीवर की तुलना में सिकुड़ कर एक चौथाई रह गया था- यह सब अत्यधिक शराब सेवन से होने वाली सिरोसिस बीमारी के लक्षण भी हैं.
बीथोवन के परिवार में कई लोग शराब पीते थे, उनकी दादी शराब पीती थीं और पिता की ख्याति शराबी के तौर पर थी. प्रोफ़ेसर टुनब्रिज के मुताबिक़ बीथोवन नियमित तौर पर वाइन पीते थे, सामाजिक आयोजनों में तो बिना पानी के वाइन पीते थे.
कैलिफ़ोर्निया के सैनजोसे यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर बीथोवन स्टडीज़ के रिसर्चर विलियम मेरेडिथ, बीथोवन की वाइन पीने की लत के चलते उनके शरीर में सीसे की ज़हरीला मात्रा होने का क़यास लगाते हैं. वे इस नतीजे पर संगीतकार के बालों के रासायनिक विश्लेषण से पहुंचे, जिसके मुताबिक़ उनके बालों में सीसे की मात्रा पायी गई थी.
वाइन कारोबारी अंगूर के रस को सीसे युक्त बैरलों में किण्वित करने के लिए रखते हैं, ताकि वह मीठा और शरबत जैसा लगे, लेकिन इससे पीने वालों को काफ़ी नुक़सान होता है. इससे शरीर में सीसे की मात्रा ज़हरीले स्तर तक पहुंच सकती हैं जिससे शरीर की तंत्रिका प्रणाली को नुक़सान हो सकता है, हालांकि बीथोवन इसकी चपेट में थे, यह कहीं से ज़ाहिर नहीं होता है.
बहरे कैसे हुए बीथोवन
डॉ. वेगनर ने बीथोवन के शव परीक्षण के दौरान देखा था कि उनके सुनने की क्षमता पूरी तरह प्रभावित हुई थी और उन्होंने इसके बारे में रिपोर्ट भी किया था.
विलियम मेरेडिथ ने बीबीसी को बताया कि हो सकता है कि बीथोवन के बहरेपन का संबंध उनकी पाचन संबंधी समस्याओं से रहा हो, क्योंकि दोनों समस्याओं की शुरुआत एकसाथ हुई थी.
"इसके अलावा बीथोवन लगातार बुख़ार और सिरदर्द की शिकायत करते रहे और यह उनके पूरे जीवन चलता रहा."
मैरीलैंड स्कूल ऑफ़ मेडिसीन यूनिवर्सिटी के डॉ. फ़िलिप मैकाविएक के मुताबिक़ जन्मजात संक्रामक रोग सिफ़लिस के साइड इफ़ेक्ट के चलते भी बीथोवन के सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. सिफ़लिस बीमारी अमेरिकी महादेश से यूरोप पहुंची थी और यूरोप में हज़ारों लोगों को इसने अपनी चपेट में ले लिया था. इस बीमारी को लेकर यूरोप में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई थी और बड़ी आबादी के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई थीं.
डॉ. मैकाविएक के मुताबिक़ पाचन संबंधी मुश्किलों के चलते बीथोवन बहरे हुए थे. लेकिन न्यूरोसर्जन हेनरी मार्श का मानना है कि इन दोनों में किसी निर्णायक संबंध के सबूत अब तक नहीं मिले हैं, यह केवल अनुमान भर है.
बहरेपन का आघात
1797 से लेकर 1798 के बीच में बीथोवन को सुनने में समस्या होने लगी थी. डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने 1802 में वियना छोड़ दिया. वे शांति की तलाश में पड़ोस के शहर हेलिगनेस्टेड में रहने चले गए. यहां से उन्होंने अपने भाईयों को एक पत्र लिखा था जिसे हेलिगनेस्टेड वसीयत के नाम से भी जाना जाता है. इस पत्र में उन्होंने आत्महत्या करने के बारे में उठे ख्यालों और दूसरे लोगों से दूर रहने की ज़रूरतों के बारे में लिखा था.
बीथोवन ने लिखा, "...छह साल पहले मैं एक ख़तरनाक बीमारी से पीड़ित था, जो अक्षम डॉक्टरों ने बढ़ा दी है."
उन्होंने इस पत्र में लिखा है कि कैसे उनकी आत्मा उन्हें रोकती है, कैसे बहरापन उनकी मुश्किलों को बढ़ा है और इन सबका उनके अस्थिर व्यवहार पर क्या असर पड़ रहा है.
बीथोवन ने लिखा है, "मुझे समाज से कहीं दूर रहना चाहिए. अगर मैं लोगों के बीच जाता हूं तो मुझे भयानक पीड़ा महसूस होती है, लोग मेरी स्थिति को नोटिस करने लग जाते हैं."
अपने बहरेपन से दुखी रहने के बाद भी बीथोवन ने अपनी कला के साथ जीना जारी रखा. बीथोवन ने अपने भाईयों को पत्र ज़रूर लिखा लेकिन उन्हें भेजा नहीं. यह पत्र उनकी मौत के बाद उनके दस्तावेज़ों में मिला.
उनका लिखा एक बेहद मार्मिक पैरा इस तरह से शुरू होता है, "आह! मैं कैसे अपनी कमज़ोरी को स्वीकार करूं जो उस वक़्त मौजूद है जब मैं कहीं ज्यादा परफ़ेक्शन की स्तर तक पहुंच रहा हूं, ऐसा परफ़ेक्शन जहां बहुत कम संगीतकार पहुंच पाते हैं."
शुरुआत में बीथोवन ने लिखा है कि कुछ आवृतियों को सुनने की उनकी क्षमता चली गई है लेकिन समय के साथ उहोंने लिखा है कि अब उन्हें पूरी तरह सुनाई नहीं देता है.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज ने बताया, "ऐसी रिपोर्ट्स हैं जिससे ज़ाहिर होता है कि वे बहरे हो चुके थे और इसके चलते तेज़ बोलने लगे थे. लेकिन उनकी स्थिति कैसी थी, इसके बारे में कोई जानकारी मौजूद नहीं है."
हालांकि यह ज्ञात है कि 1818 आते आते, दूसरे लोग क्या कह रहे हैं, इसे समझना उनके लिए बेहद मुश्किल हो गया था, इसलिए वे लोगों को लिखकर सवाल देने को कहते और फिर उस पर जवाब देते थे.
हालांकि उनके जीवन के अंतिम दिनों में कुछ किस्सों के मुताबिक़ वे कुछ आवाज़ों को पहचान जाते थे, जैसे कि कोई चीख़ सुनकर वे हैरान हो जाते थे.
कंपनों से निकला संगीत
पहले बीथोवन को शादी नहीं कर पाने की हताशा थी, लेकिन बाद में अब कुछ नहीं सुन पाने की हताशा भी हो गई. लेकिन संगीत कंपोज़ करने का काम उन्होंने जारी रखा. इसी दौर में उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ, सशक्त अभिव्यक्ति वाला प्रयोगधर्मी संगीत रचा.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज के मुताबिक़ हेलिगनेस्टेड वसीयत में, "बीथोवन तय करता है कि जीवन मूल्यवान है इसलिए संगीत रचना का काम जारी रखना होगा क्योंकि संगीत ही उन्हें बचा सकता है."
बीथोवन सर्वोत्कृष्ट ढंग से पियानो बजाते थे, उन्होंने पियाने के ज़रिए संगीत रचने का काम जारी रखा, इसमें वे अलग अलग साउंड के असर को पैदा करने के लिए दूसरे तमाम उपकरणों का इस्तेमाल करते.
लेकिन बीथोवन का सबसे बेहतरीन उपकरण उनका अपना दिमाग़ ही था. प्रोफ़ेसर टुनब्रिज ने बताया, "यह ध्यान रखना होगा कि संगीतकार अपनी कल्पनाओं पर निर्भर होते हैं. वे अपने दिमाग़ की आवाज़ सुनते हैं और बीथोवन तो बचपन से ही संगीत सृजित कर रहे थे."
"वे बाहरी दुनिया को नहीं सुन सकते थे लेकिन यह मानने की कोई वजह नहीं है कि उनके मस्तिष्क के संगीत सुनने की क्षमता बिगड़ गई होगी या फिर उनकी संगीतकीय क्षमता कम हो गई होगी."
ताक़त और उल्लास
बीथोवन जो संगीत बना रहे थे उसे ही सुनने में सक्षम नहीं थे. ऐसी मुश्किलों ने बीथोवन की कला को निखारा ही. वे अपने संगीत में नयी ऊर्जा और शारीरिक हाव भाव को शामिल करने लगे, जो पहले कभी नहीं किया गया था. वास्तविकता में कई आधुनिक विश्लेषक यह मानते हैं कि बहरेपन ने बीथोवन की संगीत प्रतिभा को कई तरीक़ों से बेहतर बनाने में मदद की. ब्रिटिश संगीतकार रिचर्ड आयरेस ने बीबीसी को बताया, "अगर आप ठीक से सुन नहीं पाते हैं तो अपना संगीत रचने के लिए आपको संगीतकारों की ऊर्जा पर निर्भर करना होगा."
आप आयरेस ख़ुद बहरे हैं. उन्होंने बीथोवन और अपने बहरेपन से प्रभावित होने के पर लिखा है, "बीथोवन ने बहरेपन में शानदार संगीत का सहारा लिया, उनका संगीत बेहतर अंदाज़ में कहीं ज़्यादा स्पष्टता से ज़ाहिर भी हुआ."
आयरेस कहते हैं, "बीथोवन ने अपने संगीतकारों से यही मांगा. वे उनके शारीरिक हाव भाव और संगीत आयोजन में जितनी ऊर्जा वे लगाते, उसे बीथोवन देखते."
इसका असर यह हुआ कि बीथोवन के संगीत ने एक स्पंदन वाली गुणवत्ता हासिल की. वे अप्रत्याशित ढंग से नई गलियां तलाशने लगे, इससे हृदय विदारक और संवेदनाओं को झकझोरने वाला संगीत तैयार होने लगा- जैसा कि नौवीं सिम्फ़नी के आयोजन में स्पष्ट नज़र आया.
उदाहरण के लिए उनकी प्रस्तुति 'हेलीगर डेंकसेंग' भी ले सकेत हैं जिसमें उन्होंने बीमारियों से उबरने के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया है.
मानवता और उम्मीद
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज के मुताबिक़, "उनके बीमार और असमाजिक होने के ढेरों सबूत हैं लेकिन बीथोवन इन सबसे कहीं अधिक थे. उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष भी था जो कहीं दोस्ताना और मज़ाक़िया था. ऐसे तमाम उदाहरण भी हैं जो उनके मानवीय गुणों को रेखांकित करते हैं."
टुनब्रिज के मुताबिक़ निजी तौर पर अपने सबसे मुश्किल पलों के दौरान बीथोवन ने 'ओड टू जॉय' का संगीत रचा होगा क्योंकि उन्हें भविष्य को लेकर कुछ उम्मीद दिखी होगी और यह भाव उनके बाद के कामों पर भी दिखा.
बचपन से ही बीथोवन जर्मन कवि फ्रेडिरक स्किलेर की कविता को संगीत में पिरोना चाहते थे और आख़िर में उसे नौवीं सिम्फ़नी में शामिल भी किया.
प्रोफ़ेसर टुनब्रिज ने बताया, "कविता में जो भाईचारे और ख़ुशी को लेकर जो विचार थे उसी आदर्श की बीथोवन ने राजनीति और समाज में बड़े पैमाने पर उम्मीद की थी."
टुनब्रिज ने कहा, "बीथोवन ने जीवन के आख़िरी समय तक उम्मीद क़ायम रखी, यह वैसा पहलू जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती."
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