चिन्मयी त्रिपाठी, संतोष झा और अजय रायः हिंदी कविता को सुर और लय देने वाले चेहरे

इमेज स्रोत, Chinmayi
- Author, मंगलेश डबराल
- पदनाम, कवि और पत्रकार
उत्तर भारत में आध्यात्मिक सूफी कविता को काफी गाया जाता रहा है और कुछ गायक-समूह कबीर, शाह लतीफ़ भिटाई, बुल्ले शाह, गोरखनाथ आदि को बहुत खूबी से गाते हैं.
लेकिन हिंदी की आधुनिक कविता के गायन के नाम पर सिर्फ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला याद आते हैं, जिनका एक गीत 'वर दे वीणावादिनी, वर दे' बड़े पैमाने पर स्कूलों-कॉलेजों में गाया जाता रहा है.
छायावाद के दो और कवियों महादेवी वर्मा या जयशंकर प्रसाद के भी दो-चार गीत कभी-कभी सुनाई दे जाते हैं: 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे' या 'मैं नीर भरी दुःख की बदली' या 'पंथ रहने दो अपरिचित, प्राण रहने दो अकेला.' लेकिन हिंदी या उसके शिक्षण के संस्थानों में बाद की कविता को गाने की कोशिश लगभग नहीं हुई.
लेकिन जब-तब यह सवाल उठता है कि क्या आधुनिक कविता को गाया जा सकता है. क्या उसमें सांगीतिक तत्व खोजे जा सकते हैं? जिन कविताओं के भीतर संगीत की संभावनाएं होती हैं, उन्हें गाना कोई बड़ी चुनौती नहीं है, लेकिन आधुनिक कविता ज़्यादातर छंद और तुकों से मुक्त है, इसलिए उसे संगीतबद्ध करने में मुश्किलें पेश आती हैं.
मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' जैसी जटिल और निबंध-सरीखी कविताओं को संगीत में कैसे ढाला जाए?

इमेज स्रोत, Chinmayi
कविता के गायन का सुनियोजित सिलसिला
प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय ने ऐसी गद्यात्मक कविता को गाने के कुछ प्रयोग किए थे.
वे संगीत के जानकार थे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों और फिर 'लिखावट' संस्था के साथ मिलकर उन्होंने कई कवियों की रचनाओं का गायन और पाठ किया और अपनी कुछ गंभीर कविताओं की स्वरलिपि भी बनायी, जिनमें एक थी: 'तुमने मार डाले लोग/ कई लोग/ क्योंकि उनमें जीने की आस नहीं थी.'
रघुवीर सहाय कहते थे, "कविता को इस तरह गाना चाहिए कि उसमें बहुत गाना न हो और एक धीमा संगीत हो जो शब्दों पर हावी न हो जाए, बल्कि उनके अर्थों का विस्तार करता हुआ लगे."
लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है और कविता के गायन के आयाम उभर रहे हैं. युवा गायिका चिन्मयी त्रिपाठी ने अपने सहयोगी जोएल मुख़र्जी के साथ 'म्यूजिक एंड पोएट्री प्रोजेक्ट' नाम से कविता के गायन का एक सुनियोजित सिलसिला शुरू किया है और कुछ एल्बम भी जारी किए हैं, जिनमें कबीर, मीराबाई, निराला, महादेवी वर्मा, दिनकर, निदा फाजली, धर्मवीर भारती, अनामिका आदि की रचनाएँ आधुनिक संगीत संरचना के साथ गायी गई हैं.
हाल ही में चिन्मयी और जोएल ने हिंदी-उर्दू के चर्चित युवा कवि हुसैन हैदरी और गीतकार शैली के साथ एक नया प्रयोग किया: उन्होंने पटकथा और संवाद लेखकों की एक संस्था के लिए हैदरी के गीत 'हम लिखते हैं' की एक सार्थक और नाटकीय प्रस्तुति की है, जिसकी काफी चर्चा हुई.

इमेज स्रोत, Chinmayi
गायन में नयापन आया है...
चिन्मयी ने संगत के प्रचलित वाद्यों, हारमोनियम, सितार, तबला आदि को छोड़ कर गिटार, खंजीरा और लातिन अमेरिकी ड्रम काखोन जैसे पश्चिमी वाद्य अपनाए हैं जिससे गायन में नयापन आया है.
निराला के गीत 'बांधो न नाव इस ठांव बंधु' और 'सखि, वसंत आया', महादेवी वर्मा के 'चिर सजग आँखें उनींदी/आज कैसा व्यस्त बाना/ जाग तुझको दूर जाना', निदा फाजली की ग़ज़ल 'गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला', धर्मवीर भारती की 'आजकल चांदनी तमाम रात जागती है' को पहले इस तरह कभी नहीं गाया गया.
समकालीन कवि अनामिका ने चिन्मयी के लिए ख़ास तौर से एक कविता 'खुशगप्पियाँ' लिखी है- 'किस अंगीठी से उठा है ये धुआं/भुन रहीं मीठी मकइयाँ फिर कहाँ.'
क्या उन्होंने कभी हरिवंश राय बच्चन की कविता भी गाई है? पूछने पर चिन्मयी एक दिलचस्प जवाब देती हैं, "उनकी एक कविता 'डोंगा डोले' गाने की कोशिश की थी जो एक लोकगीत पर आधारित है, लेकिन बाद में कॉपीराइट की अनुमति नहीं मिली."
सागर में जन्मी चिन्मयी के पिता आधुनिक प्रगतिशील दृष्टि के संस्कृत विद्वान डॉक्टर राधावल्लभ त्रिपाठी हैं जिन्होंने संस्कृत काव्य की एक 'दूसरी परंपरा' यानी क्लासिकी धारा से अलग उसके यथार्थवादी स्वर से पाठकों को परिचित कराया है.

इमेज स्रोत, Chinmayi
हिन्दी की छंद-विहीन कविता
चिन्मयी बताती हैं, "मेरी मां भी हिंदी पढ़ाती रहीं. हमारे घर का माहौल साहित्यिक-सांस्कृतिक है. मैं बचपन से ही कविता पढ़ती थी, कविता लिखती थी और मैंने कई वर्ष तक संगीत-विदुषी डॉक्टर अलकनंदा पालनीटकर से शास्त्रीय संगीत सीखा. मैं संगीत में नया कुछ करना चाहती थी. ऐसा कुछ, जो फ़िल्म संगीत से बिलकुल हट कर हो. मैं सोचती थी, क्या गंभीर कविता भी लोकप्रिय हो सकती है."
एमबीए और कॉर्पोरेट नौकरी करने के बावजूद चिन्मयी का काव्य-प्रेम उन्हें मुम्बई ले गया. 'म्यूजिक एंड पोएट्री प्रोजेक्ट' शुरू करने से पहले वे 'सौंगड्यू' नामक संस्था से जुडीं, फिर टाइम्स म्यूजिक और वर्ल्ड वाइड रिकॉर्ड्स के साथ कविता के दो एल्बम भी जारी किए.

इमेज स्रोत, Chinmayi
चिन्मयी बताती हैं, "पहले अपनी पसंद की कुछ छायावादी कविताओं को संगीतबद्ध किया. नौकरी से बचाए हुए पैसे से एल्बम निकाला, लेकिन साधन कम पड गए तो चंदा किया, जिसे आजकल की भाषा में क्राउड फंडिंग कहा जाता है. ऐसी फंडिंग की एक संस्था 'विशबेरी' ने हमारी बहुत मदद की."
चिन्मयी अब हिन्दी की छंद-विहीन कविता में गायन के प्रयोग करके यह देखना चाहती हैं कि उसमें लोकप्रिय होने की कितनी संभावनाएं हैं. भारत और ब्रिटेन में कई साहित्य समारोहों, नेहरू सेंटर, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, वर्ली फेस्टिवल, साहित्य आजतक, इंडिया हैबिटाट सेंटर आदि में उनके बैंड का स्वागत हुआ है.
फिलहाल कुछ वेबसाइटों पर उनका गायन प्रसारित होता है जहां वे अपनी कवितायें भी पढ़ती हैं. इस बैंड की एक खूबी यह भी है कि उसके पश्चिमी वाद्य बहुत मुखर या शोर-भरे नहीं हैं, उन्हें कविता के मूड के अनुरूप बजाया जाता है और संगीत या ऑर्केस्ट्रा शब्दों और अर्थों को दबाने का काम नहीं करता. चिन्मयी ओर जोएल का गायन संगीत सुनने से ज्यादा कविता सुनने का अनुभव है.

इमेज स्रोत, Santosh Jha FACEBOOK
लयात्मक संभावना
मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' के गायन की चुनौती पटना की सांस्कृतिक संस्था 'हिरावल' ने साकार की है. इस प्रतिबद्ध संस्था से जुड़े संतोष झा, सुमन कुमार और उनके साथियों ने निराला, जयशंकर प्रसाद, फैज़ अहमद फैज़, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, त्रिलोचन, गोरख पाण्डेय, वीरेन डंगवाल आदि की रचनाओं के अलावा 'अँधेरे में' का एक अंश मर्मस्पर्शी स्वर-संरचना के साथ गाया है. 'ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया/ जीवन क्या जिया.'
संतोष झा कहते हैं, "मुक्तिबोध की कविता को संगीत में ढालना मुश्किल काम था क्योंकि वह गद्य जैसी और छंद-तुक से मुक्त है, उसमें लयात्मक संभावना बहुत कम है. लेकिन हमारा गायन का नज़रिया गैर-पारंपरिक है, इसलिए अचानक धुन बन गई. शमशेर की कविता 'ये शाम है कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का' और त्रिलोचन की कविता 'पथ पर चलते रहो निरंतर/सूनापन हो या निर्जन हो' भी इसी तरह संगीत में ढलीं. कठिन कविताओं में हम लोग कविता-पंक्तियों को पागलों की तरह कई ढंग से गाने-गुनगुनाने की कोशिश करते हैं और अचानक कोई संरचना तैयार हो जाती है."
निराला के गीत 'गहन है यह अन्धकारा/ स्वार्थ के अवगुंठनों से हो गया लुंठन हमारा' और 'तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन' की संरचनाएं भी इसी तरह प्रभावशाली बन पड़ी हैं.
'हिरावल' की प्रस्तुतियों की धुनें मुख्यतः संतोष झा तैयार करते हैं और सुमन कुमार उसके ख़ास गायक हैं.
संतोष झा कहते हैं, "कविताओं-गीतों का चयन करने की बुनियादी शर्त यह है कि वे समाज के लिए प्रासंगिक हों, कुछ सोचने को विवश करें और बदलाव की प्रेरणा दे सकें. हमारी प्रस्तुतियां आम जन के लिए हैं, लेकिन ढर्रे से अलग हट कर हैं. साधनों की कमी से हम व्यापक जन समुदाय तक नहीं पंहुच पाते, लेकिन कोशिश जारी है."

इमेज स्रोत, Manglesh Dabral
शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित
कोलकाता के वरिष्ठ गायक डॉक्टर अजय रॉय का जीवन हिंदी कविता के गायन को समर्पित रहा है.
कुछ साल पहले उनकी गाई हुई निराला की दस रचनाओं का एल्बम केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से जारी हुआ था, जिसमें 'बादल राग', 'मैं अकेला/ आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला', 'बांधो न नाव इस ठांव', 'राम की शक्तिपूजा', 'जागो फिर एक बार' और 'तिमिर दारण मिहिर दरसो' आदि थीं.
उन्होंने कबीर और मलूकदास समेत भक्तिकाल और छायावाद के प्रमुख कवियों, मैथिलीशरण गुप्त, नागर्जुन, त्रिलोचन, दिनकर से लेकर अदम गोंडवी और बिलकुल नए कवियों को भी गाया.
उनकी कविता-यात्रा 45 वर्ष पहले गोपाल सिंह नेपाली के गीतों से शुरू हुई थी और एक गीत 'बदनाम हुए बटमार मगर घर को रखवालों ने लूटा' खासा लोकप्रिय हुआ. अजय गायन में किसी विदेशी वाद्य का इस्तेमाल नहीं करते, हारमोनियम, तबला, सितार, सरोद का सहारा लेते हैं, लेकिन ऑर्केस्ट्रा बहुत मुखर नहीं रहता.
शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित अजय कहते हैं, "मैंने शुरू में तय कर लिया था कि साहित्य ही गाऊंगा, उससे हट कर कुछ नहीं. कोलकाता के एक कॉलेज में पढ़ाने के दौरान मैंने छात्रों को कविता के गायन में प्रेरित किया. सैकड़ों कार्यक्रम किए, जहां आम श्रोताओं ने मुझे हाथों-हाथ लिया. भारत की आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर एक कार्यक्रम में मलिका पुखराज और रेशमा की ग़ज़लों के साथ हिंदी कविता की प्रस्तुति करके वाहवाही हासिल की."
उनका मानना है कि "अगर हम जन साधारण कविता को तक पंहुचाएं तो समाज में नई सांस्कृतिक चेतना पैदा हो सकती है. लेकिन इसके लिए संस्थागत प्रयासों का बहुत अभाव है. दरअसल हिंदी के लोग ही हिंदी का सम्मान नहीं करते."
अजय रॉय ने बच्चन के भी कई गीत गाए, लेकिन बाद में 'प्रताड़ित होने के डर से उन्हें गाना छोड़ दिया.'
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















