दुनिया की सबसे ख़तरनाक़ कब्रगाह!

    • Author, क्रिस्टियान बोरिस
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

सन 1986 में यूक्रेन के चेर्नोबिल में हुआ एटमी हादसा, दुनिया का सबसे भयानक न्यूक्लियर हादसा था. इसे तीस साल से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है. मगर आज भी इसकी यादें और मंज़र दोनों लोगों के ज़हन में ताज़ा हैं.

उस वक़्त चेर्नोबिल, सोवियत संघ का हिस्सा था. इसके एक रिएक्टर में पड़ताल के दौरान धमाका हो गया था. इस प्लांट में लगी आग नौ दिन तक दहकती रही थी.

इस एटमी प्लांट से निकले रेडिएशन का असर पूरे यूरोप पर दिखा. यूक्रेन, बेलारूस और रूस के इलाक़े इस एटमी तबाही से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए थे.

इस धमाके की गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है कि चेर्नोबिल के अलावा सिर्फ़ जापान के फुकुशिमा में हुए न्यूक्लियर हादसे को ही लेवल सात का ख़तरा बताया गया था.

दुनिया की सबसे बड़ी इमारत

पिछले तीस साल से इस हादसे के असर को कम करने और ख़त्म करने की कोशिशें जारी हैं. अब चेर्नोबिल के एटमी प्लांट को एक विशाल इमारत के अंदर बंद करने का काम चल रहा है. इस इमारत को सैक्रोफेगस के नाम से जाना जाएगा.

यानि मेटल और पत्थर की बनी हुई ऐसी बड़ी क़ब्रगाह जहां दुनिया का सबसे ख़तरनाक एटमी कचरा क़रीब सौ साल के लिए बंद कर दिया जाएगा. इसे न्यू 'सेफ़-कन्फ़ाइनमेंट' के नाम से भी पुकारा जाता है.

सैक्रोफेगस की ऊंचाई अमरीका की स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी से भी ज़्यादा है. ये ब्रिटेन के मशहूर फुटबॉल स्टेडियम वेंबले से भी ज़्यादा बड़ा है. इसा वज़न 35 हज़ार टन है.

इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है इसकी मेटल से बनी छत. ये ना सिर्फ़ दुनिया की सबसे बड़ी इमारत होगी, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि जब इंसान की जान जैसी क़ीमती चीज़ दांव पर लगी हो तो उसे बचाने के लिए वो क्या क़दम उठा सकता है.

नब्बे के दशक में चेर्नोबिल के ग्राउंड ज़ीरो पर जब इस इमारत को बनाने का ज़िक्र छिड़ा तो लोगों को लगा ये कभी अमल में नहीं लाया जाने वाला आइडिया है. क्योंकि उस वक़्त भी इस जगह रेडिएशन था, जोकि काफ़ी ख़तरनाक था.

आज इस प्रोजेक्ट पर काम करते हुए दो दशक से ज़्यादा का समय गुज़र चुका है. अब ये अपने आख़री मरहले में है.

तबाही की मंज़र

1986 में जब चेर्नोबिल में एटमी हादसा हुआ तो सोवियत संघ वजूद में था. पहले तो वहां की कम्युनिस्ट सरकार ने इसे छुपाने की कोशिश की. मगर इसमें नाकाम रहने पर वहां के लोगों ने इसे कम करके बताने की कोशिश की.

बाक़ी दुनिया को इस हादसे की गंभीरता का एहसास उस वक़्त हुआ, जब इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के डायरेक्टर हैंस ब्लिक्स ने इस इलाक़े का हेलीकॉप्टर से मुआयना किया.

ब्लिक्स कहते हैं कि उस वक़्त हादसे की जगह से काला धुआं निकल रहा था. जिस बड़े पैमाने पर तबाही मची थी उसे देखते हुए, उस वक़्त तो वो खाली ये सोचने लगे कि इस चुनौती से कैसे निपटा जाए. उनकी संस्था इसमें क्या कर सकती है.

जब ब्लिक्स ने इस हादसे की तबाही की रिपोर्ट सामने रखी, तो सोवियत सरकार के कुछ अधिकारी उस रिपोर्ट को गंभीरता से लेने के लिए राज़ी नहीं थे. क्योंकि इससे उनके पूरे एटमी कार्यक्रम पर सवाल उठ रहा था.

लेकिन जब हैंस ब्लिक्स ने मास्को में ख़ुद इस तबाही का मंज़र बयान किया और पूरी जानकारी दी, तो सोवियत संघ ने उनसे हालात से निपटने में मदद मांगी.

रेडिएशन

हादसे के बाद रेडिएशन रोकने के लिए सोवियत संघ ने कुछ लोगों को वहां भेजा था. इनका काम रेडिएशन को रोकना और तबाह हुए रिएक्टर की आग पर क़ाबू पाना था. इन्हें 'लिक्विडेटर' कहा गया.

पहली टीम को आग पर क़ाबू पाने में नौ दिन लग गए थे. इस दौरान 28 लोग रेडिएशन की वजह से मौत का शिकार हुए थे. ये सभी फायर ब्रिगेड के कर्मचारी थे. इन्हें यूक्रेन के इवानो फ़्रेंक्विस्क से आग बुझाने और रिएक्टर से रेडिएशन फैलने से रोकने के लिए चेर्नोबिल भेजा गया था.

हैंस ब्लिक्स कहते हैं कि इनमें से किसी को भी अंदाज़ा नहीं था वो क्या करने वाले हैं. वो तीसरे और चौथे रिएक्टर को निष्क्रिय करने के काम में मसरूफ़ थे.

रिएक्टर की आग बुझने के बाद सबसे पहले चौथे रिएक्टर को बंद करने की कोशिश की गई. इसे आज के सैक्रोफ़ेगस की तरह के ही मेटल के बक्से में बंद किया गया. इसे बनाने में 206 दिन का वक़्त लगा था. चार लाख क्यूबिक मीटर कंक्रीट और 7300 टन मेटल की मदद से इसका फ्रेमवर्क तैयार किया गया.

सफाई में दस लाख लोगों को लगाया गया

इस काम में लगे यूक्रेन के यारोस्लाव मेलनिक बताते हैं कि वो लोग तीन तीन शिफ़्टों में काम करते थे. क्योंकि कोई भी वर्कर रेडिएशन के डर से एक बार में पांच से सात मिनट तक ही काम करता था.

उसके बाद दूसरी शिफ़्ट के वर्कर काम करते थे. इस काम को पूरा करने में पूरे सोवियत संघ से क़रीब दस लाख लोगों को लगाया गया था.

इन सहायकों में से कुछ ने आग बुझाने का काम किया था. तो किसी ने आम लोगों को इलाक़ा खाली कराने में मदद की थी. इस काम में बहुत से लोगों की मौत हुई थी. कुछ जानकार ये तादाद हज़ारों में बताते हैं.

ये लोग एटमी प्लांट से निकले रेडिएशन के शिकार हुए थे. हालांकि मरने वालों के आंकड़े को लेकर मतभेद हो सकते हैं. मगर सभी लोग इस बात पर एकमत हैं कि राहत के काम में बहुत से लोग रेडिएशन के के संपर्क में आए और लंबे समय तक बीमारियों का शिकार रहे.

सोवियत लिक्वीडेटर्स ने जो पहला सैक्रोफ़ेगस बनाया वो, इस मुश्किल का स्थायी समाधान नहीं था.

यूक्रेन ने मांगी मदद

1991 में सोवियत संघ के ख़ात्मे के बाद यूक्रेन ने चेर्नोबिल को ज़्यादा सुरक्षित बनाने के लिए पूरी दुनिया से मदद मांगी. तमाम लोगों ने अलग अलग तरह के मशविरे दिए. ये मुक़ाबला जीता फ्रेंच कंपनियों के एक ग्रुप ने. जिनके प्लान का नाम था 'रिज़ॉल्यूशन'.

इस तबाही के एक दशक बाद 1997 में अमरीका के डेनवर में जी-7 देशों के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें चेर्नोबिल के लिए तीन सौ अरब डॉलर के ख़र्च को मंज़ूरी दी गई.

इस प्रोजेक्ट से यूरोपियन बैंक ऑफ रिकंस्ट्रक्शन के विंस नोवाक शुरू से ही जुड़े रहे हैं. उनकी उम्र हादसे के वक़्त तीस के आस-पास थी. आज वो साठ साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं. वो उस दौर की चुनौतियों को याद करते हैं.

विंस नोवाक बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहला काम मौजूदा उस वक़्त मौजूद सैक्रोफ़ेगस को मज़बूत करना था. क्योंकि हादसे के बाद वो जल्दबाज़ी में बनाया गया था. रेडिएशन का स्तर इतने सालों बाद भी बहुत ज़्यादा था.

ऐसे में सबसे पहली चिंता मज़दूरों की सुरक्षा की थी. काम को अंजाम देना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि इस प्रोजेक्ट में सैकड़ों लोगों का दिमाग काम कर रहा था.

पहले बना ढांचा कमज़ोर था

इंजीनियरों की अलग सोच थी और सियासी लोगों के अपने हित थे. संचालक अपने तरीक़े से काम कराना चाहते थे. लेकिन 12 न्यूक्लियर एक्सपर्ट की टीम ऐसी थी जो किसी सरकार या संस्था की बात सुनने वालों में से नहीं थी.

वो पैसे लगाने वालों की बात सुनते थे. इस टीम के मुखिया इटली के कार्लोस मैनसिनी थे.

जिस वक़्त इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की इस टीम ने काम शुरू किया, उस वक़्त भी रेडिएशन का स्तर जानलेवा लेवल से बीस गुना ज़्यादा था. हादसे को दस साल बीत चुके थे.

हड़बड़ी में रिएक्टर के इर्द-गिर्द जो ढांचा खड़ा किया गया था, उसके टूटने का ख़तरा था.

दस साल पहले सोवियत इंजीनियरों ने हेलीकॉप्टर से टुकड़े गिरा-गिराकर सैक्रोफ़ेगस को तैयार किया था. यानी इसके खंबे एक दूसरे से जुड़े नहीं थे. इनके ढहने का डर था. ऐसा होता तो चेरनोबिल में दूसरी तबाही मच सकती थी. पहली शर्त तबाह हुए रिएक्टर के इर्द-गिर्द बनी इस इमारत को ढहने से रोकना था. वरना वहां काम करना मुश्किल हो जाता.

इस बीच यूक्रेन की सरकार ने फ्रेंच कंपनी के बनाए नए सैक्रोफ़ेगस के ढांचे के डिज़ाइन को 2004 में मंज़ूरी दे दी. कर्मचारियों को रेडिएशन के असर से बचाने के लिए कंपनी ने हादसे की जगह से 300 मीटर दूर ढ़ांचा तैयार करके, उसे बाद में उसकी सही जगह पर फिट करने का फ़ैसला किया.

30 साल बाद बना सुरक्षित ढांचा

सैक्रोफ़ेगस के अलग अलग हिस्से इटली में बनाए गए थे. फिर इन्हें पानी के जहाज़ से यूक्रेन लाकर, वहां से ट्रक से चेर्नोबिल पहुंचाया गया. इस काम मे 18 पानी के जहाज़ और 2500 ट्रक काम में लगे थे.

सैक्रोफ़ेगस का बुनियादी ढांचा 2014 तक बनकर तैयार हो चुका था. अगले दो सालों में इसके भीतरी हिस्से का काम पूरा किया गया. पूरी बिल्डिंग को इसके सही स्थान पर 29 नवंबर 2016 को हादसे के पूरे 30 साल बाद लगाया गया.

इस काम को पूरा करने का सेहरा कार्लोस मैनसिनी और उनके 10 हज़ार साथियों को जाता है, जिन्होंने इस काम को पूरा करने में अपना योगदान दिया.

जिस वक़्त सैक्रोफेगस को तैयार किया जा रहा था, यूक्रेन में दो दो क्रांतियां हो चुकी थीं. आज यूक्रेन में गृह युद्ध छिड़ा हुआ है.

कार्लोस मैनसिनी कहते हैं कि उन्हें अपनी कामयाबी पर गर्व है. दुनिया को भी मैनसिनी को सलाम करना चाहिए. उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े एटमी हादसे की जगह पर एक यादगार मकबरा जो बनाया है!

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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